RBI का बड़ा फैसला: डिजिटल पेमेंट में अब 2-लेयर सिक्योरिटी, फ्रॉड पर लगेगा लगाम!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
RBI का बड़ा फैसला: डिजिटल पेमेंट में अब 2-लेयर सिक्योरिटी, फ्रॉड पर लगेगा लगाम!
Overview

भारत का सेंट्रल बैंक, RBI, **1 अप्रैल 2026** से डिजिटल पेमेंट के लिए नए सुरक्षा नियम लागू करने जा रहा है, जिसमें SMS कोड से आगे बढ़कर कम से कम दो सुरक्षा कदम अनिवार्य होंगे। इस नियम के तहत, फ्रॉड की वित्तीय जिम्मेदारी पेमेंट प्रोवाइडर्स पर शिफ्ट हो जाएगी, बशर्ते वे नियमों का पालन करें। इसका मकसद बढ़ते डिजिटल फ्रॉड को रोकना और ग्राहकों का भरोसा फिर से हासिल करना है। अंतर्राष्ट्रीय पेमेंट के लिए **1 अक्टूबर 2026** तक का समय दिया गया है।

RBI ने डिजिटल पेमेंट सिस्टम को और ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए कमर कस ली है। 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले नए नियमों के तहत, अब ट्रांजैक्शन के लिए सिर्फ साधारण SMS कोड से काम नहीं चलेगा।

क्यों हो रहा है ये बदलाव? बढ़ते फ्रॉड ने RBI को घेरा

भारत में डिजिटल पेमेंट्स का बोलबाला है, जो अब 99.8% ट्रांजैक्शन वॉल्यूम संभालते हैं। हालांकि, इस तेजी के साथ-साथ फ्रॉड के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। मार्च 2024 को खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में फ्रॉड से ₹14.57 अरब का भारी नुकसान हुआ, जो पिछली बार से 5 गुना ज्यादा है। फेक पेमेंट रिक्वेस्ट और AI की मदद से की जाने वाली धोखाधड़ी जैसी घटनाएं आम हो गई हैं, जिसके चलते RBI को फाइनेंशियल सिस्टम को मजबूत करने पर मजबूर होना पड़ा है।

नई सुरक्षा: साधारण OTP से कहीं बढ़कर

पेमेंट्स के लिए अब यूजर्स को मल्टी-लेयर वेरिफिकेशन से गुजरना होगा। इसमें आमतौर पर कम से कम दो फैक्टर्स का कॉम्बिनेशन शामिल होगा, जैसे कि PIN के साथ फिंगरप्रिंट या फेशियल स्कैन, या फिर एक डिवाइस कन्फर्मेशन के साथ वन-टाइम पासवर्ड (OTP)। RBI डायनामिक ऑथेंटिकेशन को भी बढ़ावा दे रहा है, जहां हर ट्रांजैक्शन के लिए एक सिक्योरिटी एलिमेंट बिल्कुल नया होता है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये एडवांस तरीके ट्रांजैक्शन की सफलता दर को बेहतर बना सकते हैं, क्योंकि ये OTP फेल होने जैसी आम समस्याओं को कम करेंगे।

किसकी होगी जिम्मेदारी? पेमेंट प्रोवाइडर्स पर आया फ्रॉड का रिस्क

नए रेगुलेशंस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि अगर पेमेंट प्रोवाइडर्स इन नए सुरक्षा मानकों को पूरा करने में नाकाम रहते हैं और उनके सिस्टम की खामियों के कारण ट्रांजैक्शन में फ्रॉड होता है, तो इसकी वित्तीय जिम्मेदारी उन्हीं की होगी। इससे कंप्लायंस (नियमों का पालन) एक कोर रिस्क मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी बन जाती है। भले ही मुख्य लक्ष्य सुरक्षा बढ़ाना है, लेकिन यूजर की सुविधा में थोड़ा समझौता हो सकता है। हालांकि, रिस्क-बेस्ड सिस्टम, जो केवल जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त जांच जोड़ते हैं, सुरक्षा और स्पीड के बीच संतुलन बनाने की उम्मीद है। कुछ ट्रांजैक्शन, जैसे छोटे कॉन्टैक्टलेस पेमेंट्स, रिकरिंग ऑटो-डेबिट्स और कुछ कम वैल्यू वाले ऑफलाइन पेमेंट्स, पहले की तरह सुचारू रहेंगे।

भारत का डिजिटल पेमेंट: एक ग्लोबल ट्रेंड

यह कदम भारत को उन अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के साथ खड़ा करता है जो मजबूत ऑथेंटिकेशन के जरिए बढ़ते डिजिटल फ्रॉड से मुकाबला कर रहे हैं। 1 अक्टूबर 2026 से अंतर्राष्ट्रीय पेमेंट के लिए यह नियम लागू होंगे। RBI का यह निर्देश एक अधिक भरोसेमंद डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम बनाने का लक्ष्य रखता है, जो भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल इकोनॉमी के लिए महत्वपूर्ण है। व्यवसायों के लिए, ये बदलाव एक सुरक्षित ऑपरेटिंग एनवायरनमेंट का वादा करते हैं, जिससे फ्रॉड से होने वाले नुकसान का जोखिम कम होगा और डिजिटल ट्रांजैक्शन में अधिक विश्वास पैदा होगा।

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