लिक्विडिटी का अनोखा विरोधाभास (Liquidity Paradox)
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने दिसंबर 2024 से अर्थव्यवस्था को विकास की ओर ले जाने की रणनीति पर काम करना शुरू किया है, और महंगाई पर चिंता को थोड़ा कम किया है। इस नई रणनीति के तहत, पिछले 14 महीनों में, यानी जनवरी 2026 तक, बैंकिंग सिस्टम में ₹17.7 ट्रिलियन से ज़्यादा की रिकॉर्ड लिक्विडिटी डाली गई है। इसके लिए ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMOs), कैश रिजर्व रेशियो (CRR) में कटौती और फॉरेन एक्सचेंज (FX) बाय-सेल स्वैप जैसे कई बड़े कदम उठाए गए हैं, ताकि बैंक ज़्यादा लोन दे सकें। लेकिन, इन तमाम कोशिशों के बावजूद सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी नहीं दिख रही है, और मनी मार्केट की ब्याज दरें अपेक्षा से कहीं ज़्यादा बढ़ रही हैं। यह एक बड़ा विरोधाभास (paradox) बन गया है।
ब्याज दरें बढ़ीं, लिक्विडिटी कम
जनवरी 2026 तक, बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का स्तर केवल ₹1.5 ट्रिलियन था, जो कि नेट डिमांड और टाइम लायबिलिटी (NDTL) का महज़ 0.6% है। आम तौर पर, मॉनेटरी ईजिंग (मौद्रिक नरमी) के दौर में यह आंकड़ा 1% से ऊपर रहना स्वस्थ माना जाता है। इस स्थिति को और भी खराब कर रही है सरकार के पास जमा भारी कैश बैलेंस, जो कि प्रभावी रूप से सिस्टम से पैसा निकाल लेता है। नतीजतन, मनी मार्केट की दरें तेज़ी से बढ़ी हैं। उदाहरण के लिए, तीन महीने के सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) की दरें अगस्त-अक्टूबर 2025 के लगभग 5.80% से बढ़कर जनवरी 2026 तक 7.20% के पार चली गईं। यानी, इनमें 140 बेसिस पॉइंट (1.40%) का इजाफा हुआ। 10-साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड भी फरवरी 2026 के मध्य तक 6.68% पर थी, जो एक साल पहले की तुलना में अधिक है। यह सब RBI की नरम मौद्रिक नीति और क्रेडिट को बढ़ावा देने के लक्ष्य के ठीक विपरीत इशारा कर रहा है।
डॉलर की बिक्री और कैपिटल आउटफ्लो ने खींचा पैसा
विश्लेषण से पता चलता है कि RBI द्वारा सिस्टम में डाली गई ज़्यादातर लिक्विडिटी उन कारकों द्वारा सोख ली गई है जो केंद्रीय बैंक के प्रयासों को नाकाम कर रहे हैं। भारतीय रुपये को स्थिर रखने के लिए, RBI ने स्पॉट और फॉरवर्ड मार्केट में बड़े पैमाने पर डॉलर बेचे हैं। अनुमान है कि इन डॉलर की बिक्री से सिस्टम से लगभग ₹9.2 ट्रिलियन निकल गए, भले ही FX स्वैप का भी हिसाब लगाया गया हो। यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPIs) में भारी कमी (capital outflows) आई है। ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी हो रहा है, जहाँ उभरते बाज़ार (emerging markets) इसी तरह के दबाव का सामना कर रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (दिसंबर 2025 में 10-साल की यील्ड करीब 4.19%) का बढ़ना है, जो पूंजी को सुरक्षित निवेश की ओर आकर्षित कर रहा है। इसके अलावा, आम जनता द्वारा मुद्रा की निकासी भी बढ़ी है, जो फाइनेंशियल ईयर 2026 के पहले 10 महीनों में पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में तीन गुना ज़्यादा रही। इसने लिक्विडिटी ड्रेन में लगभग 30% का योगदान दिया। कुल मिलाकर, RBI द्वारा डाली गई लिक्विडिटी का केवल 2% ही प्रभावी रूप से सिस्टम की लिक्विडिटी को बढ़ा पाया।
फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व की हकीकत
ऊपरी तौर पर देखने पर, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) लगभग $700 बिलियन के आसपास स्थिर दिख रहा है, और जनवरी 2026 में यह $724 बिलियन के शिखर पर भी पहुंचा था। लेकिन, यह स्थिरता मुख्य रूप से सोने की होल्डिंग्स में हुई भारी वृद्धि और फॉरवर्ड बुक के बढ़ने के कारण है, जिसने वास्तविक विदेशी मुद्रा संपत्तियों में आई गिरावट को ढक लिया है। फॉरवर्ड देनदारियों का हिसाब लगाने के बाद, जनवरी 2026 तक भारत का प्रभावी FX भंडार लगभग $650 बिलियन तक गिर गया था। यह स्थिति बाहरी खाते (external account) में एक कमजोरी को दर्शाती है। चिंता की बात यह है कि शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) इनफ्लो में भारी गिरावट आई है, जो FY25 में घटकर केवल $1 बिलियन रह गया, जबकि FY24 में यह $10 बिलियन था। भले ही सकल इनफ्लो (gross inflows) मजबूत रहे हों। भारतीय रुपया भी अपने क्षेत्रीय साथियों के मुकाबले कमजोर हुआ है। पिछले 12 महीनों में यह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 5.28% तक गिर गया है, और दिसंबर 2025 तक यह 91 के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया था।
बाज़ार के लिए जोखिम और व्यापार समझौते की उम्मीद
RBI की लिक्विडिटी मैनेजमेंट लगातार बाहरी दबावों और कुछ संरचनात्मक समस्याओं से बाधित हो रही है। डॉलर की बिक्री के माध्यम से रुपये की लिक्विडिटी में भारी कमी, पूंजी पलायन (capital flight) और मुद्रा अवमूल्यन (currency depreciation) को नियंत्रित करने की आवश्यकता का सीधा परिणाम है। यह उभरते बाज़ारों के लिए एक आम चुनौती है, खासकर तब जब वैश्विक स्तर पर मॉनेटरी टाइटनिंग (monetary tightening) चल रही हो। कई विकसित देशों के विपरीत, जहाँ कमोडिटी की कीमतों में नरमी से फायदा हो सकता है, भारत का व्यापार घाटा (trade deficit) काफी बढ़ गया है। अक्टूबर 2025 में यह रिकॉर्ड $41.68 बिलियन तक पहुंच गया था, जिसमें सोने का आयात भी एक प्रमुख कारण रहा। हालांकि, अमेरिका के साथ हालिया अंतरिम व्यापार समझौते (interim trade deal) से कुछ राहत मिलने की उम्मीद है, जिससे विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) इनफ्लो में सुधार हो सकता है। लेकिन, अंतर्निहित कमजोरी अभी भी बनी हुई है। इसके अलावा, बैंकिंग सेक्टर के लिए जमा राशि जुटाना (deposit mobilization) एक महत्वपूर्ण चुनौती है, क्योंकि प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और चालू खाता बचत (CASA) की वृद्धि धीमी पड़ रही है। इससे बैंकों को अस्थिर बाज़ार फंडिंग पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है, जो लिक्विडिटी की मौजूदा चुनौतियों को और बढ़ाएगा।
आगे का रास्ता और उम्मीदें
फिलहाल, लिक्विडिटी में कमी का सबसे बड़ा कारण RBI का फॉरेन एक्सचेंज (FX) बाज़ार में हस्तक्षेप बना हुआ है। हालांकि केंद्रीय बैंक बड़ी मात्रा में OMO खरीद (FY26 के सरकारी बॉन्ड जारी करने का 47%) जैसे विभिन्न साधनों का उपयोग करके टिकाऊ लिक्विडिटी डाल रहा है और यील्ड को प्रबंधित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन पूंजी के निरंतर आउटफ्लो और रुपये की मांग के कारण इसकी प्रभावशीलता पर सवाल बना हुआ है। हाल ही में की गई CRR कटौती और VRRR नीलामी का उद्देश्य घरेलू लिक्विडिटी की समस्या को दूर करना है। लेकिन, विकास को प्राथमिकता देने वाली RBI की रणनीति की सफलता पूंजी इनफ्लो की स्थिरता और बाहरी आर्थिक माहौल पर बहुत हद तक निर्भर करती है। अमेरिका के साथ हुआ अंतरिम व्यापार समझौता निश्चित रूप से एक सकारात्मक कारक (tailwind) साबित हो सकता है, लेकिन भारतीय रुपया और घरेलू लिक्विडिटी की स्थितियाँ वैश्विक वित्तीय प्रवाह और RBI की इन आउटफ्लो को प्रभावी ढंग से रोकने की क्षमता के प्रति बेहद संवेदनशील बनी रहेंगी।
