RBI की अगली मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक 3 से 5 अगस्त के बीच होनी है। ज्यादातर एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बार भी रेपो रेट (Repo Rate) में कोई बदलाव नहीं होगा और इसे मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखा जाएगा।
Detailed Coverage
रेपो रेट पर यथास्थिति की उम्मीद
अगस्त महीने की 3 से 5 तारीख के बीच होने वाली रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक पर पूरे बाज़ार की नज़रें टिकी हैं। बाज़ार के जानकारों और इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि RBI इस बार भी ब्याज दरों, यानी रेपो रेट (Repo Rate) में कोई फेरबदल नहीं करेगा। RBI का मुख्य ध्यान घरेलू और ग्लोबल इकोनॉमी पर पड़ रहे हालिया दबावों के बीच स्थिरता बनाए रखने पर होगा।
बढ़ती क्रूड ऑयल कीमतों का असर
MPC के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ग्लोबल एनर्जी मार्केट में जारी उथल-पुथल है। जियो-पॉलिटिकल टेंशन और सप्लाई चेन में संभावित रुकावटों के चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतें फिर से $100 प्रति बैरल के करीब पहुँच गई हैं। तेल की बढ़ी हुई कीमतें भारत के इम्पोर्ट बिल को बढ़ा सकती हैं, जिससे महंगाई (Inflation) बढ़ने का खतरा है। अगर कंपनियाँ बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, तो RBI इस स्थिति में कोई भी ऐसा कदम उठाने से बचेगा जिससे महंगाई को और बढ़ावा मिले। मौजूदा समय में महंगाई दर 4.4% है, जो पिछले महीने 3.9% थी।
कैपिटल इनफ्लो पर RBI की नज़र
पिछली जून की मीटिंग में RBI ने भारतीय रुपये को सहारा देने और कैपिटल इनफ्लो (Capital Inflow) को बढ़ाने के लिए कुछ नए उपाय लागू किए थे। इनमें फॉरेन करेंसी डिपॉज़िट्स (Foreign Currency Deposits) की हेजिंग कॉस्ट (Hedging Cost) में बदलाव और कुछ खास बॉन्ड (Bond) को शामिल करने की नीतियां शामिल थीं। इन पहलों से अब तक $20 बिलियन से ज़्यादा का इनफ्लो आया है, लेकिन इसके बावजूद रुपये में हाल ही में गिरावट का दबाव देखा गया है। ऐसे में RBI अब इन उपायों की लंबी अवधि की प्रभावशीलता का आंकलन करने की स्थिति में है। फाइनेंशियल एनालिस्ट्स का मानना है कि RBI इन उपायों के असर का और पुख्ता डेटा आने का इंतज़ार करेगा, उसके बाद ही कोई नए स्ट्रक्चरल बदलाव पर विचार करेगा।
ग्रोथ और मॉनसून का आउटलुक
RBI से उम्मीद की जा रही है कि वह फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए अपनी ग्रोथ फोरकास्ट (Growth Forecast) को 6.6% के आसपास बनाए रखेगा। हालाँकि, यह अनुमान ग्लोबल ट्रेड में रुकावटों और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष जैसे बाहरी कारकों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। घरेलू मोर्चे पर, मॉनसून का प्रदर्शन एक महत्वपूर्ण फैक्टर बना रहेगा। अगर मॉनसून कमजोर रहता है, तो कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर असर पड़ सकता है, जिससे महंगाई के आउटलुक में और जटिलता आ सकती है। इन्वेस्टर्स RBI की मीटिंग के बाद आने वाले स्टेटमेंट में इस बात पर ध्यान देंगे कि ये सभी फैक्टर साल के बाकी समय में मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।
