WMA लिमिट में भारी इजाफा, क्या हैं वजहें?
RBI और सरकार के बीच हुए समझौते के तहत, फाइनेंशियल ईयर 2026-27 (अप्रैल-सितंबर 2026) की पहली छमाही के लिए WMA लिमिट को बढ़ाकर ₹2.5 लाख करोड़ कर दिया गया है। पिछले फाइनेंशियल ईयर 2025-26 की इसी अवधि के लिए यह लिमिट ₹1.50 लाख करोड़ थी। WMA सुविधा सरकार के लिए आय और व्यय के बीच अस्थायी अंतर को पूरा करने का एक अहम जरिया है। यह सुविधा शॉर्ट-टर्म कैश फ्लो की जरूरतों को पूरा करने के लिए है, न कि फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटे) को फाइनेंस करने के लिए।
सब्सिडी, टैक्स कट और ग्लोबल रिस्क का असर
इस बड़ी बढ़ोतरी के पीछे कई मुख्य कारण हैं। सरकार के वित्त पर बढ़ते दबाव का अनुमान है, जिसमें सब्सिडियों (खासकर उर्वरक और ऊर्जा) पर भारी खर्च, पेट्रोल और डीजल पर हाल में की गई एक्साइज ड्यूटी कटौती, और वैश्विक अनिश्चितताएं शामिल हैं। ऊर्जा और उर्वरक की कीमतों में इजाफे से सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण पेट्रोल-डीजल पर प्रति लीटर ₹10 की एक्साइज ड्यूटी कटौती से सरकार को सालाना करीब ₹1.5-1.6 लाख करोड़ का नुकसान होने का अनुमान है। वहीं, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जैसे भू-राजनीतिक जोखिमों ने अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों को दोगुना से अधिक बढ़ा दिया है, जिससे सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा है।
फिस्कल हेल्थ पर चिंता और बॉन्ड मार्केट का रुख
WMA लिमिट में यह बड़ी वृद्धि, ईंधन पर टैक्स कटौती और वैश्विक ऊर्जा कीमतों के दबाव के साथ मिलकर, सरकार के वित्तीय स्वास्थ्य पर कुछ सवाल खड़े करती है। हालाँकि सरकार ने FY27 के लिए फिस्कल डेफिसिट को GDP के 4.3% तक लाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन ये दबाव लक्ष्य से चूकने का कारण बन सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की शॉर्ट-टर्म उधारी पर निर्भरता बताती है कि सरकार अपने रेवेन्यू अनुमानों से अधिक नकदी की जरूरत के लिए तैयार है। इस बीच, भू-राजनीतिक चिंताओं के कारण बॉन्ड मार्केट में थोड़ी सतर्कता देखी जा रही है। 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड में भी उछाल आया है। सरकार ने FY27 की पहली छमाही में ₹8.20 लाख करोड़ का मार्केट से उधार लेने का प्लान बनाया है, जो कि बॉन्ड मार्केट को स्थिर रखने की रणनीति का हिस्सा है।