RBI का बड़ा फैसला: क्या रेपो रेट रहेगा स्थिर? महंगाई और रुपये पर बढ़ी चिंता

ECONOMY
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AuthorNeha Patil|Published at:
RBI का बड़ा फैसला: क्या रेपो रेट रहेगा स्थिर? महंगाई और रुपये पर बढ़ी चिंता
Overview

RBI की अगली मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग 5 जून को होनी है। ज़्यादातर इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि RBI इस बार भी रेपो रेट को **5.25%** पर स्थिर रखेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि RBI ग्रोथ को प्राथमिकता देना चाहता है। लेकिन, बढ़ती तेल की कीमतें और लगातार गिरता रुपया, साल के अंत तक इंटरेस्ट रेट बढ़ाने (Hawkish Tightening Cycle) की आशंका को बढ़ा रहे हैं।

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ग्रोथ या महंगाई: RBI के सामने दुविधा?

मार्केट पार्टिसिपेंट्स RBI की आने वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) के फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं। माना जा रहा है कि इस बार भी कोई बदलाव नहीं होगा और रेपो रेट 5.25% पर ही बना रहेगा। हालांकि, देश की इन्फ्लेशन रेट अभी कंट्रोल में है, लेकिन RBI के लिए असली चुनौती घरेलू मांग नहीं, बल्कि एनर्जी यानी तेल की कीमतों में उछाल से आने वाली इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन है। जून में रेट होल्ड करके, कमेटी यह देखना चाहती है कि ग्लोबल सप्लाई शॉक अस्थायी हैं या कमोडिटी की कीमतों में बड़ा बदलाव ला रहे हैं।

रुपये को बचाने की जद्दोजहद

भारतीय रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है, जिससे मॉनेटरी पॉलिसी और फॉरेन एक्सचेंज स्टेबिलिटी के बीच एक टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। आमतौर पर इंटरेस्ट रेट्स को डोमेस्टिक प्राइस स्टेबिलिटी के लिए तय किया जाता है, लेकिन रुपये की लगातार गिरती वैल्यू महंगाई को और बढ़ा सकती है। जब इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देश अपने लोकल करेंसी को मजबूत करने के लिए रेट बढ़ा रहे हैं, तब RBI पर भी बढ़ते इंटरेस्ट रेट डिफरेंशियल को लेकर सवाल उठ रहे हैं। फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व का इस्तेमाल करके रुपये को सपोर्ट करना एक महंगा और अस्थायी समाधान है, और ऐसा लग रहा है कि सिर्फ फॉरेक्स रिजर्व पर निर्भर रहने से बात नहीं बनेगी।

स्ट्रक्चरल रिस्क और बियरिश (Bearish) संकेत

कुछ जानकारों का मानना है कि RBI को तुरंत सख्त कदम उठाने चाहिए, वरना उसकी विश्वसनीयता (Credibility) पर सवाल उठ सकते हैं। अगर RBI चुपचाप बैठा रहा और कैपिटल आउटफ्लो जारी रहा, तो मार्केट यह मान लेगा कि साल के अंत में एक बड़ा एडजस्टमेंट करना पड़ेगा। कैपिटल इनफ्लो में स्ट्रक्चरल कमजोरी एक बड़ा रिस्क है, जिससे इकोनॉमी ग्लोबल रिस्क एपेटाइट में बदलाव के प्रति ज़्यादा सेंसेटिव हो जाती है। इसके अलावा, केवल हेडलाइन इन्फ्लेशन टारगेट पर फोकस करने से होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) में दिख रही बड़ी वोलैटिलिटी छिप जाती है, जो हाल के महीनों में चिंताजनक रही है। अगर तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो पॉलिसी में देरी के कारण बाद में और भी तेज़ी से रेट बढ़ाने पड़ सकते हैं, जिससे बॉन्ड और इक्विटी मार्केट्स में ज़्यादा वोलैटिलिटी आ सकती है।

साल के अंत तक रेट हाइक की बढ़ती उम्मीद

शुरुआती अनुमानों के मुकाबले, अब ज़्यादातर एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2026 की चौथी तिमाही तक इकोनॉमी में कॉन्ट्रैक्शनरी बायस (Contractionary Bias) यानी मंदी का रुख आ सकता है। हालांकि, अभी होने वाली मीटिंग में RBI का रुख नरम रहने की उम्मीद है, लेकिन बिना एक्शन के वक़्त कम होता जा रहा है। एनालिस्ट्स अब इस बात पर सहमत हो रहे हैं कि डोमेस्टिक पॉलिसी को ग्लोबल फाइनेंशियल सेंटर्स के टाइटनिंग साइकिल के साथ अलाइन करने के लिए 25-बेसिस-पॉइंट की बढ़ोतरी ज़रूरी है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि पॉलिसी फ्लेक्सिबिलिटी का दौर खत्म होने वाला है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.