फॉरेक्स मार्केट में RBI की बढ़ती दखल
RBI दिसंबर में $10 अरब डॉलर की शुद्ध बिकवाली के साथ, नवंबर के $9.7 अरब डॉलर के मुकाबले अपनी करेंसी मैनेजमेंट की कोशिशों को और तेज करता दिख रहा है। इस दौरान, RBI ने $18.3 अरब डॉलर की खरीद और $28.3 अरब डॉलर की बिकवाली की। यह कदम ग्लोबल करेंसी में चल रही उथल-पुथल और कैपिटल फ्लो की अस्थिरता के बीच भारतीय रुपये को स्थिरता देने के RBI के इरादे को दर्शाता है। पिछले फाइनेंशियल ईयर की समान अवधि में $36.1 अरब डॉलर की तुलना में, इस साल अब तक कुल शुद्ध बिक्री $53.3 अरब डॉलर तक पहुंच गई है, जो संभावित गिरावट के दबाव को संभालने के लिए एक ज्यादा सक्रिय दृष्टिकोण का संकेत देता है। हालांकि, इस तरह के लगातार इंटरवेंशन से फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व पर दबाव पड़ सकता है, अगर यह इनफ्लो के बराबर न हो।
फॉरवर्ड मार्केट में बदली तस्वीर
बढ़ी हुई दखलंदाजी के बावजूद, फॉरवर्ड मार्केट में रुपये की नेट शॉर्ट डॉलर पोजीशन दिसंबर के अंत तक घटकर $62.35 अरब रह गई, जो नवंबर में $66.04 अरब थी। यह दर्शाता है कि रुपये के खिलाफ सट्टा लगने वाली पोजीशन में मामूली कमी आई है, खासकर एक साल से कम अवधि वाले कॉन्ट्रैक्ट्स में, जहां लगभग $7 अरब की गिरावट देखी गई। हालांकि, एक साल से अधिक की अवधि वाले फॉरवर्ड पोजीशन में लगभग $3 अरब की बढ़ोतरी हुई है, जिससे कुल नेट शॉर्ट पोजीशन का $31 अरब हिस्सा एक साल से अधिक की अवधि वाले कॉन्ट्रैक्ट्स में केंद्रित हो गया है। इससे पता चलता है कि अल्पावधि की हेजिंग या सट्टा गतिविधियां भले ही कम हो रही हों, लेकिन रुपये को लेकर लंबी अवधि की चिंताएं या पोजीशन अभी भी बनी हुई हैं।
रुपये का 'असली' मूल्य कमजोर
भारतीय रुपये का रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) जनवरी 2026 में और गिरकर 94.76 पर आ गया है, जो दिसंबर 2025 में 95.30 था। REER, जो महंगाई के अंतर को भी ध्यान में रखता है, करेंसी की कॉम्पिटिटिवनेस (प्रतिस्पर्धात्मकता) का एक अहम पैमाना है। 100 से नीचे का यह स्तर बताता है कि व्यापारिक भागीदारों की तुलना में रुपया वास्तविक अर्थों में कमजोर हुआ है। यह स्थिति भारतीय एक्सपोर्ट को विदेशी मुद्रा में सस्ता बनाकर अधिक आकर्षक बना सकती है, जिससे एक्सपोर्ट ग्रोथ को बढ़ावा मिल सकता है। दूसरी ओर, इससे इम्पोर्ट महंगे हो जाएंगे, जो महंगाई को बढ़ा सकते हैं। REER में लगातार गिरावट यह संकेत दे रही है कि बाहरी मूल्य प्रतिस्पर्धात्मकता रुपये के मूल्यांकन और RBI की नीतिगत सोच को प्रभावित कर रही है, जिसमें एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने और इम्पोर्ट लागत को मैनेज करने के बीच संतुलन बनाना शामिल है।
क्या हैं आगे की चिंताएं?
RBI के हस्तक्षेप से रुपये को स्थिर करने की कोशिश के बावजूद, डॉलर की बिकवाली के बढ़ते पैमाने से फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व की स्थिरता पर सवाल उठ सकते हैं। यदि रुपये पर बाजार का दबाव बढ़ता है, तो लगातार आक्रामक हस्तक्षेप से रिजर्व में बड़ी कमी आ सकती है, जिससे भविष्य में अस्थिरता को प्रबंधित करने की RBI की क्षमता सीमित हो सकती है। लंबी अवधि की नेट शॉर्ट डॉलर पोजीशन में वृद्धि यह भी दर्शाती है कि बाजार सहभागियों को रुपये में लगातार कमजोरी की उम्मीद हो सकती है, जिसके पीछे कुछ संरचनात्मक आर्थिक चुनौतियां या ग्लोबल अनिश्चितता हो सकती है, जिसे केवल हस्तक्षेप से पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, लगातार हस्तक्षेप के माध्यम से रुपये की गिरावट को कृत्रिम रूप से दबाना, भले ही यह इम्पोर्ट लागत को नियंत्रित करने में सहायक हो, लेकिन यह अंतर्निहित आर्थिक कमजोरियों को छिपा सकता है और एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस के लिए REER के संकेत की प्रभावशीलता को कम कर सकता है।
भविष्य की राह
आगे चलकर, RBI संभवतः रुपये का सक्रिय प्रबंधन जारी रखेगा, जिसमें स्थिरता की आवश्यकता और विनिमय दर के आर्थिक प्रभावों के बीच संतुलन बनाना होगा। बाजार सहभागियों की निगाहें फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व के रुझान, ग्लोबल सेंटीमेंट में बदलाव और घरेलू आर्थिक नीतियों पर बनी रहेंगी। मौजूदा REER स्तर भारतीय एक्सपोर्ट के लिए एक सकारात्मक संकेत देता है, लेकिन बाहरी मांग में कमजोरी या कैपिटल के दोबारा बाहर जाने की स्थिति में और अधिक बड़े हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ सकती है।