पॉलिसी का ठहराव
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (Monetary Policy Committee) ने जून 2026 की मीटिंग में प्रमुख रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला किया है। महंगाई की चिंताओं के बावजूद, दरों में बढ़ोतरी की आक्रामक मांगों को फिलहाल टाल दिया गया है। केंद्रीय बैंक ने फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए महंगाई का अनुमान 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया है, जिसका मुख्य कारण कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता को बताया गया है। वहीं, GDP ग्रोथ का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया गया है। यह फैसला एक नाजुक संतुलन को दर्शाता है: अर्थव्यवस्था को वैश्विक सप्लाई-साइड झटकों से बचाना और साथ ही घरेलू ग्रोथ को स्थिर रखना।
कैपिटल गेन टैक्स में छूट का बड़ा कदम
लगातार हो रहे विदेशी पोर्टफोलियो आउटफ्लो (Foreign Portfolio Outflow) से निपटने के लिए, भारतीय सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया है, जो 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी है। इसके तहत, विदेशी संस्थागत निवेशकों (Foreign Institutional Investors) को सरकारी सिक्योरिटीज पर कैपिटल गेन (Capital Gain) और विदहोल्डिंग टैक्स (Withholding Tax) से छूट दी जाएगी। यह कदम निवेशकों को बेहतर पोस्ट-टैक्स रिटर्न (Post-tax Return) दिलाने के उद्देश्य से उठाया गया है। इन बाधाओं को दूर करके, नीति निर्माता भारत के डेट मार्केट (Debt Market) की अपील को मजबूत करना चाहते हैं, जिससे लिक्विडिटी (Liquidity) बनी रहे, जहां ऊंची ब्याज दरें अन्यथा अर्थव्यवस्था के लिए बोझ बन सकती थीं।
एनालिस्ट्स की राय
बाजार के जानकारों का मानना है कि RBI के इस न्यूट्रल (Neutral) रुख को काफी हद तक पहले ही भांप लिया गया था। हालांकि, टैक्स में छूट मिलने से घरेलू डेट इंस्ट्रूमेंट्स (Debt Instruments) में निवेश को बढ़ावा मिलेगा। एनालिस्ट्स का कहना है कि रेपो रेट स्थिर रहने से यील्ड कर्व (Yield Curve) पर नीतिगत बढ़ोतरी का दबाव कम होगा, जिससे बॉन्ड की कीमतों में मार्केट की शक्तियों और इंडेक्स-फ्लो (Index Flow) का प्रभाव बढ़ेगा। यह इक्विटी मार्केट (Equity Market) में देखी गई अस्थिरता के विपरीत है, जहां विदेशी निवेशकों ने इस साल अब तक ₹2.6 लाख करोड़ से अधिक की बिकवाली की है। इस कदम को भारत की उभरती हुई बाजार की अन्य डेट डेस्टिनेशन्स (Emerging Market Debt Destinations) के मुकाबले प्रतिस्पर्धी स्थिति को बेहतर बनाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।
जोखिम और कमजोरियां
यह रणनीति जोखिमों से रहित नहीं है। पिछले एक साल में रुपया में आई बड़ी गिरावट को थामने के लिए विदेशी पूंजी पर निर्भरता, बाजार को वैश्विक जोखिम उठाने की क्षमता में अचानक बदलाव के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसके अलावा, हालांकि टैक्स छूट सॉवरेन बॉन्ड (Sovereign Bond) में निवेश को आकर्षक बनाती है, यह मौजूदा फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) की चुनौतियों या ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता के प्रभाव को संबोधित नहीं करती है। HDFC AMC जैसी फर्मों के मैनेजमेंट का कहना है कि भविष्य के एडजस्टमेंट्स (Adjustments) की टाइमिंग पर कड़ी नजर रखी जाएगी, खासकर अगर ऊर्जा की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं। ऐसी स्थिति में, केंद्रीय बैंक के न्यूट्रल रुख पर तीसरी या चौथी तिमाही में फिर से विचार करना पड़ सकता है।
भविष्य का दृष्टिकोण
आगे चलकर, फोकस इस बात पर होगा कि इन उपायों का बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (Balance of Payments) पर क्या असर पड़ता है। हालांकि प्रमुख वैश्विक इंडेक्स (Global Indices) में शामिल होना मध्य-वर्ष की चर्चा का विषय बना हुआ है, लेकिन अधिकारियों की तत्काल प्राथमिकता रुपये को स्थिर करना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी पूंजी सॉवरेन बॉन्ड मार्केट की ओर आकर्षित हो। आम राय यह है कि RBI तब तक अपनी वर्तमान स्थिति बनाए रखेगा जब तक कि भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं हो जाता या घरेलू मांग में गैर-मुद्रास्फीतिकारी मजबूती के संकेत नहीं दिखते।
