पॉलिसी का 'कठिन' फैसला
भारतीय शेयर बाजारों ने शुक्रवार को एक उतार-चढ़ाव भरे दिन का सामना किया। एक तरफ जहां RBI के महंगाई और ग्रोथ को लेकर दिए गए आंकड़े बाजार को झटका दे रहे थे, वहीं दूसरी तरफ सरकार ने विदेशी निवेशकों को वापस लाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC), जिसके मुखिया गवर्नर संजय मल्होत्रा हैं, ने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला किया है। यह फैसला दुनिया भर में बढ़ते जिओ-पॉलिटिकल तनाव और एनर्जी की कीमतों में उछाल के बीच लिया गया है।
महंगाई का डर और ग्रोथ का अनुमान घटा
RBI ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अपने अनुमानों में बड़ा बदलाव किया है। MPC ने फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए रियल GDP ग्रोथ के अनुमान को घटाकर 6.6% कर दिया है, जो पहले 6.9% था। इसके साथ ही, चालू फाइनेंशियल ईयर के लिए महंगाई का अनुमान 50 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.1% कर दिया गया है। गवर्नर मल्होत्रा ने बताया कि दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर काफी अनिश्चितता है, और अल नीनो की वजह से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में और तेजी आ सकती है। हालांकि, कोर इन्फ्लेशन अभी स्थिर है, लेकिन RBI वैश्विक महंगाई के असर पर कड़ी नजर रख रहा है।
FIIs के लिए टैक्स में बड़ी राहत
भारतीय रुपये को स्थिर करने और बॉन्ड मार्केट को सहारा देने के लिए, सरकार ने इनकम-टैक्स (अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस, 2026 जारी किया है। इसके तहत, 1 अप्रैल 2026 से फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) को सरकारी सिक्योरिटीज से होने वाली ब्याज आय और कैपिटल गेन्स पर टैक्स में छूट मिलेगी। यह कदम विदेशी पूंजी के भारी बहिर्वाह (Outflows) के जवाब में उठाया गया है। इस साल अब तक FIIs भारतीय इक्विटी से ₹2.6 लाख करोड़ से ज्यादा निकाल चुके हैं। सरकार उम्मीद कर रही है कि इस टैक्स छूट से सॉवरेन डेट (सरकारी कर्ज) में निवेश को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निवेश का एक मजबूत जरिया बनेगा।
स्ट्रक्चरल रिस्क और आगे की राह
टैक्स छूट के ऐलान पर बाजार की मिली-जुली प्रतिक्रिया ने मैक्रो इकोनॉमिक माहौल को लेकर गहरी शंकाओं को उजागर किया है। जहां बॉन्ड मार्केट को इस नई टैक्स व्यवस्था से फायदा हो सकता है, वहीं इक्विटी सेंटीमेंट अभी भी RBI के महंगाई पर सख्त रुख और भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण दबाव में है। एनालिस्ट्स का मानना है कि अगर उधारी की लागत बढ़ी रही, तो कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आ सकता है। ऐसे में, निवेशकों को अब बॉन्ड मार्केट में बेहतर लिक्विडिटी और ग्रोथ की रफ्तार में सुस्ती के बीच संतुलन बनाना होगा।
