RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने 6 फरवरी, 2026 को हुई अपनी बैठक के बाद सभी की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए पॉलिसी रेपो रेट को 5.25% पर ही स्थिर रखा है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने यह घोषणा करते हुए बताया कि सेंट्रल बैंक ने अपना 'न्यूट्रल' (तटस्थ) रुख बरकरार रखा है। यह फैसला डोमेस्टिक इकोनॉमी की मजबूत ग्रोथ को बनाए रखने के साथ-साथ ग्लोबल जियोपॉलिटिकल टेंशन (भू-राजनीतिक तनाव) और फिस्कल सस्टेनेबिलिटी (राजकोषीय स्थिरता) जैसी चिंताओं को ध्यान में रखकर लिया गया है।
India की इकोनॉमिक आउटलुक को मजबूत करते हुए, RBI ने फाइनेंशियल ईयर 2027 (FY27) के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाया है। अब Q1 FY27 में 6.9% और Q2 FY27 में 7% ग्रोथ का अनुमान है। अन्य अनुमान भी FY27 में ग्रोथ को 6.8% से 7.2% के बीच रखते हैं। वहीं, महंगाई की बात करें तो यह RBI के 2% से 6% के टारगेट बैंड में बनी हुई है। अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच एवरेज महंगाई 1.7% दर्ज की गई, जबकि FY27 के लिए इसका अनुमान 2.1% है।
इन घरेलू स्तर पर अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद, RBI आगे और ब्याज दरों में कटौती करने से कतरा रहा है। दरअसल, फरवरी 2025 से अब तक कुल 125 बेसिस पॉइंट्स (bps) की कटौती हो चुकी है, जिसमें आखिरी कटौती दिसंबर 2025 में हुई थी। ऐसे में, अब आगे की राह फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) को काबू में रखने और बाहरी अनिश्चितताओं का सामना करने पर केंद्रित है।
दुनिया भर में धीमी ग्रोथ और बढ़ती जियोपॉलिटिकल टेंशन के बीच, भारत ने अपनी ट्रेड पोजीशन को मजबूत करने के लिए बड़े कदम उठाए हैं। जनवरी 2026 के आखिर में इंडिया-यूरोपियन यूनियन (EU) के बीच एक अहम फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) फाइनल हुआ। इसके ठीक बाद, फरवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिका के साथ एक ट्रेड डील हुई, जिसने ज्यादातर इंडियन गुड्स पर टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया। इन डील्स का मकसद ग्लोबल डिमांड में कमी के प्रभाव को कम करना और ट्रेड को बढ़ावा देना है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि RBI की रेट-कटिंग साइकिल फिलहाल रुक गई है और अब सेंट्रल बैंक 'वेट-एंड-वॉच' मोड में रहेगा। उनका कहना है कि RBI अब लिक्विडिटी मैनेजमेंट (तरलता प्रबंधन) और बॉन्ड मार्केट स्टेबिलिटी (बॉन्ड बाजार की स्थिरता) पर अधिक ध्यान केंद्रित करेगा। यूनियन बजट 2026 में कैपिटल एक्सपेंडिचर (पूंजीगत व्यय) पर जोर और इन नए ट्रेड एग्रीमेंट्स से इकोनॉमी को ग्रोथ का मजबूत आधार मिलेगा, लेकिन फिस्कल कंसॉलिडेशन (राजकोषीय समेकन) एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता बनी रहेगी।