आरबीआी (RBI) का बड़ा फैसला! रेपो रेट पर 'नो चेंज', पर महंगाई के बादल मंडराए; खेती पर मौसम की मार

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
आरबीआी (RBI) का बड़ा फैसला! रेपो रेट पर 'नो चेंज', पर महंगाई के बादल मंडराए; खेती पर मौसम की मार
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने अहम फैसला सुनाते हुए **रेपो रेट को 5.25%** पर बरकरार रखा है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब महंगाई के अनुमानों को ऊपर की ओर संशोधित किया गया है, जबकि देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) ग्रोथ भी मजबूत बना हुआ है।

RBI की राह: ग्रोथ और महंगाई में संतुलन की कोशिश

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा की अगुवाई वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने फरवरी 2026 की बैठक के बाद रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला किया है। यह निर्णय बाजार की उम्मीदों के अनुरूप था और अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को दर्शाता है। सेंट्रल बैंक का मानना है कि फिलहाल यह दर ग्रोथ को सहारा देने और महंगाई को काबू में रखने के बीच संतुलन बनाने के लिए उपयुक्त है।

हालांकि, MPC ने फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए महंगाई (Inflation) के पूर्वानुमानों को बढ़ा दिया है। अब चौथे क्वार्टर FY26 के लिए कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) महंगाई 3.2% रहने का अनुमान है। वहीं, फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली और दूसरी तिमाही में यह क्रमश: 4.0% और 4.2% तक जा सकती है। इस बढ़ोतरी के पीछे ग्लोबल भू-राजनीतिक तनाव और कमोडिटी प्राइसेस में जारी अस्थिरता को मुख्य वजह बताया गया है। इन बाहरी दबावों के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था की डोमेस्टिक मजबूती को देखते हुए GDP ग्रोथ का अनुमान फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए बढ़ाकर 7.4% कर दिया गया है। MPC का न्यूट्रल पॉलिसी स्टान्स यह बताता है कि आगे के फैसले महंगाई और ग्रोथ की दिशा पर निर्भर करेंगे।

रोबस्टा कॉफी से रबर तक, मौसम की मार से खेती पर संकट

जहां एक ओर RBI अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहा है, वहीं देश का कृषि क्षेत्र, जो GDP में करीब 17-18% का योगदान देता है, गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। बेमौसम और अत्यधिक बारिश ने रोबस्टा कॉफी, सुपारी (arecanut) और रबर जैसी महत्वपूर्ण बागवानी फसलों (plantation crops) को भारी नुकसान पहुंचाया है।

कर्नाटक प्लांटर्स एसोसिएशन के मुताबिक, खराब मौसम के कारण 2025-26 के फसल वर्ष के लिए कॉफी उत्पादन में 30,000 टन तक की कमी आ सकती है। वहीं, 2025 में बीमारियों और अप्रत्याशित मौसम के चलते सुपारी के उत्पादन में लगभग 50% की भारी गिरावट दर्ज की गई। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि ये फसलें देश के लिए महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange Earnings) कमाती हैं। अकेले भारत के कॉफी निर्यात से 2 अरब डॉलर से अधिक की कमाई का अनुमान है।

इस मुश्किल घड़ी में, बागवानी फसलों के लिए विशेष फसल बीमा (crop insurance) की मांग फिर जोर पकड़ रही है। मौजूदा योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) इन विशेष फसलों के लिए व्यावहारिक नहीं मानी जातीं, जिससे किसान मौसमी झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। यह न केवल किसानों की आजीविका पर असर डालता है, बल्कि देश की फॉरेक्स रिजर्व के लिए भी एक बड़ा खतरा पैदा करता है।

भविष्य की राह: बीमा और जोखिम प्रबंधन की जरूरत

RBI का ब्याज दरों को स्थिर रखने का फैसला 2025 के अंत की मॉनेटरी पॉलिसी कंसॉलिडेशन को दर्शाता है, जब आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ-साथ महंगाई को नियंत्रित करने के लिए दरों में धीरे-धीरे कटौती की गई थी। विश्लेषकों को उम्मीद है कि 2026 तक नीतिगत दरों में स्थिरता बनी रहेगी, लेकिन महंगाई और ग्रोथ पर नजर रखनी होगी।

कृषि क्षेत्र के लिए, आगे का रास्ता सिर्फ जलवायु परिवर्तन के अनुकूल टिकाऊ खेती के तरीकों को अपनाने का नहीं, बल्कि बीमा गैप को तुरंत पाटने का भी है। यूनियन बजट 2026-27 में घोषित व्यापक आर्थिक स्थिरता के सरकारी फोकस को अब क्षेत्र-विशिष्ट हस्तक्षेपों तक विस्तारित करने की आवश्यकता है, ताकि बागवानी किसानों की वित्तीय सुरक्षा बढ़ाई जा सके और अप्रत्याशित मौसम की घटनाओं से महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा आय की रक्षा की जा सके।

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