खपत और तेल की कीमतों का खेल
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का वित्त वर्ष 2027 के लिए 6.9% ग्रोथ का अनुमान, घरेलू मांग और बाहरी कमोडिटी की कीमतों के बीच एक नाजुक संतुलन पर टिका है। हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का उपयोग और सर्विस सेक्टर के एक्सपोर्ट में उछाल आया है, लेकिन इस रफ्तार को बनाए रखने की लागत काफी बढ़ गई है। ब्रेंट क्रूड ऑयल $93 से $96 प्रति बैरल के बीच बना हुआ है, जिसने करंट अकाउंट पर महंगाई का दबाव बढ़ाया है।
संरचनात्मक चुनौती
पिछले फाइनेंशियल ईयर की तुलना में इस बार RBI का रुख थोड़ा सतर्क है। जहां रियल GDP पिछले वित्त वर्ष में 7.6% बढ़ी थी, वहीं इस बार ग्रोथ का टारगेट पाना मुश्किल होगा, क्योंकि ग्लोबल लिक्विडिटी टाइट हो रही है। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने जहां 6.5% का अनुमान लगाया है, वहीं RBI के मॉडल मानते हैं कि मध्य-पूर्व के भू-राजनीतिक झटके स्थानीय रहेंगे। लेकिन अगर हॉरमुज़ जलडमरूमध्य से शिपिंग में रुकावटें बढ़ती हैं, तो भारत के बढ़ते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए इंपोर्ट लागत आसमान छू लेगी। इससे Nifty 50 कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
गिरावट का डर
RBI ने ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण सप्लाई चेन पर पड़ने वाले असर को कम करके आंका है। असली खतरा यह है कि कुछ सर्विस सेक्टर्स में वास्तविक मजदूरी ऊर्जा और ट्रांसपोर्ट की बढ़ती लागत के बराबर नहीं रह सकती है। इसके अलावा, ब्रेंट क्रूड की यह अस्थिरता एक फिस्कल जोखिम भी है। अगर सरकार को डिमांड घटने से रोकने के लिए फ्यूल पर सब्सिडी देनी पड़ी, तो घाटा बढ़ जाएगा और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के लिए पैसा कम पड़ जाएगा, जिससे 6.9% ग्रोथ का टारगेट मुश्किल हो जाएगा। इतिहास गवाह है कि जब एनर्जी इंपोर्ट कुल इंपोर्ट वैल्यू के एक खास लेवल से ऊपर चला जाता है, तो करेंसी पर दबाव बढ़ता है और मॉनेटरी अथॉरिटीज को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ती हैं, जो RBI के ग्रोथ-फ्रेंडली माहौल के बिल्कुल विपरीत है।
आगे की राह
निवेशकों के लिए अब सिर्फ GDP के बड़े आंकड़े नहीं, बल्कि ग्रोथ में तिमाही दर तिमाही आने वाला बदलाव महत्वपूर्ण होगा। RBI का अनुमान है कि ग्रोथ पहले क्वार्टर में 6.8% से बढ़कर साल के आखिर तक 7.2% तक पहुंच जाएगी। इसका मतलब है कि सरकार के मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव और मध्य-पूर्व में तनाव कम होने पर काफी निर्भरता रहेगी। अगर मध्य-पूर्व में स्थिति नहीं सुधरती है, तो भारत का ग्रोथ प्रोफाइल आयातित महंगाई को संभालने की क्षमता पर ही टिका रहेगा, न कि एक्सपोर्ट बढ़ाने की क्षमता पर।
