भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने हाल ही में करीब **$40 अरब** के विदेशी फंड इनफ्लो पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ किया है कि इनफ्लो डिपॉजिट और सिक्योरिटीज के जरिए आया है। RBI का मानना है कि उनके पास लिक्विडिटी और करेंसी की अस्थिरता को संभालने के लिए पर्याप्त टूल हैं।
Detailed Coverage
विदेशी निवेश पर RBI गवर्नर का बयान
RBI गवर्नर शक्तिकांत दास ने विदेशी पूंजी प्रवाह (foreign capital inflows) और रुपये के प्रबंधन (currency management) को लेकर बाजार की चिंताओं पर बात की। उन्होंने बताया कि फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (FCNR-B) डिपॉजिट के जरिए करीब $32 अरब और जून में लागू की गई नीतिगत उपायों के बाद सरकारी सिक्योरिटीज में $7 अरब का इनफ्लो हुआ है।
रुपये की अस्थिरता और RBI का रुख
रुपये की हालिया गिरावट पर गवर्नर दास ने कहा कि यह भारत की आर्थिक बुनियाद (economic fundamentals) की कमजोरी को नहीं दर्शाता है। उन्होंने इसे डॉलर की मजबूती, भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) और उभरते बाजारों (emerging markets) की अस्थिरता जैसे बाहरी कारकों का नतीजा बताया। RBI का लक्ष्य कोई खास एक्सचेंज रेट बनाए रखना नहीं है, बल्कि केवल अत्यधिक और अल्पकालिक उतार-चढ़ाव को रोकना है।
FCNR(B) डिपॉजिट और फॉरेक्स स्वैप से जुड़े जोखिमों पर उन्होंने कहा कि सेंट्रल बैंक पूरी तरह से हेज्ड (hedged) है। विदेशी मुद्रा इनफ्लो को विदेशी संपत्तियों में निवेश किया जाता है, जिससे हेजिंग लागत के संभावित जोखिम से बचाव होता है।
महंगाई और मॉनेटरी पॉलिसी
गवर्नर दास ने दोहराया कि महंगाई पर नियंत्रण RBI का मुख्य लक्ष्य है। मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (Monetary Policy Committee) डेटा-आधारित (data-dependent) दृष्टिकोण अपना रही है। हालांकि महंगाई लक्ष्य बैंड के 4% से ऊपर बनी हुई है, लेकिन RBI को अभी व्यापक और स्थायी मूल्य वृद्धि के संकेत नहीं दिख रहे हैं। वर्तमान न्यूट्रल स्टैंस (neutral stance) वैश्विक अनिश्चितताओं से निपटने और मूल्य स्थिरता बनाए रखने के लिए जरूरी लचीलापन प्रदान करता है।
वित्तीय प्रणाली और क्रेडिट ग्रोथ
तेजी से हो रही क्रेडिट ग्रोथ से अर्थव्यवस्था के ओवरहीटिंग (overheating) के बारे में चिंताओं पर भी चर्चा हुई। दास ने जोर देकर कहा कि क्रेडिट ग्रोथ डिपॉजिट ग्रोथ से स्वाभाविक रूप से संतुलित होती है। भारतीय बैंक मजबूत कैपिटल एडिक्वेसी (capital adequacy) और लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (liquidity coverage ratios) बनाए हुए हैं। विदेशी निवेशकों की भारतीय बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) में बढ़ती रुचि को भारतीय नियामक ढांचे में विश्वास का सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
