भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की फॉरेन एक्सचेंज स्वैप फैसिलिटी के तहत जून से अब तक **$40.82 बिलियन** का भारी इनफ्लो आया है। इसका बड़ा श्रेय FCNR(B) जमाओं को जा रहा है। RBI ने यह स्कीम बाहरी रिज़र्व को मज़बूत करने और वैश्विक अनिश्चितता के बीच भुगतान संतुलन (Balance of Payments) को सहारा देने के लिए शुरू की थी।
RBI की स्वैप फैसिलिटी में रिकॉर्ड तोड़ इनफ्लो
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की ओर से जून 2026 में शुरू की गई फॉरेन एक्सचेंज स्वैप फैसिलिटी ने 31 जुलाई तक $40.82 बिलियन का इनफ्लो आकर्षित करने में ज़बरदस्त कामयाबी हासिल की है। इस स्कीम का मुख्य मकसद भारतीय बैंकिंग सिस्टम में विदेशी मुद्रा के प्रवाह को बढ़ाना है, ताकि वैश्विक बाज़ार में चल रही उथल-पुथल और कच्चे तेल जैसी ज़रूरी इम्पोर्ट्स की बढ़ी कीमतों के बीच देश के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) को सहारा मिल सके।
FCNR(B) जमाओं का दबदबा
इस कुल इनफ्लो में फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) डिपॉजिट्स, जिन्हें आमतौर पर FCNR(B) डिपॉजिट्स के नाम से जाना जाता है, का सबसे बड़ा योगदान रहा। इन्होंने अकेले $36.725 बिलियन जुटाए। ये डिपॉजिट्स नॉन-रेजिडेंट भारतीयों (NRI) द्वारा विदेशी मुद्राओं में किए जाते हैं, जिनसे बैंकों को डॉलर लिक्विडिटी बढ़ाने में मदद मिलती है। इसके अलावा, ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स (Overseas Foreign Currency Borrowings) से $2.575 बिलियन और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स (External Commercial Borrowings) से $1.516 बिलियन का इनफ्लो आया है।
बाज़ार के अनुमानों पर असर
इस शानदार नतीजे के बाद, SBI रिसर्च समेत कई ब्रोकरेज फर्मों के विश्लेषकों ने इन विंडोज के ज़रिए होने वाले कुल इनफ्लो के अनुमानों को बढ़ा दिया है। अब यह अनुमान लगाया जा रहा है कि कुल इनफ्लो $80 बिलियन से $85 बिलियन तक पहुंच सकता है। इसमें अकेले FCNR(B) डिपॉजिट्स का योगदान $65 बिलियन से $70 बिलियन रहने की उम्मीद है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि बैंक डिपॉजिटर्स और बॉरोअर्स तक पहुंचने और रियायती स्वैप विंडो का लाभ उठाने में कामयाब रहे हैं।
बैंकों की अहम भूमिका
बड़े पब्लिक सेक्टर बैंकों ने अपनी विस्तृत ब्रांच नेटवर्क का इस्तेमाल करके इन फंड्स को आकर्षित करने में सबसे सक्रिय भूमिका निभाई है। HSBC जैसे इंटरनेशनल लेंडर्स ने भी कुल फंड जुटाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। स्वैप फैसिलिटी बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा जुटाना सस्ता बनाती है, क्योंकि यह करेंसी हेजिंग से जुड़े खर्चों को कम करती है। इससे बैंकों और कंपनियों, दोनों के लिए विदेशी फंडिंग ज़्यादा आकर्षक हो जाती है।
ज़रूरी तारीखें और ध्यान देने योग्य बातें
यह फैसिलिटी कुछ खास इंस्ट्रूमेंट्स के लिए सक्रिय है, हालांकि इनकी डेडलाइन अलग-अलग है। नए FCNR(B) डिपॉजिट्स के लिए विंडो 30 सितंबर 2026 तक खुली है, जबकि ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स के लिए यह विंडो 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगी। निवेशक और बाज़ार पर नज़र रखने वाले इन तारीखों पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं, क्योंकि डेडलाइन नज़दीक आने पर इनफ्लो की गति में बदलाव आ सकता है। बैंकिंग सेक्टर की इस रफ़्तार को बनाए रखने की क्षमता आने वाले महीनों में लिक्विडिटी की मजबूती का एक अहम पैमाना होगी, जो वैश्विक वित्तीय दबाव के दौर में भारत के बाहरी खातों को स्थिर रखने में मदद करेगी।
