RBI का बड़ा दांव: $32 अरब का फॉरेक्स इनफ्लो, पर रुपया और लिक्विडिटी फ्लैट!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
RBI का बड़ा दांव: $32 अरब का फॉरेक्स इनफ्लो, पर रुपया और लिक्विडिटी फ्लैट!

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हालिया विदेशी मुद्रा जमा योजनाओं के ज़रिए **$32 बिलियन** जुटाए हैं। हालांकि, इतनी बड़ी रकम आने के बावजूद रुपया अभी भी कमजोर बना हुआ है और बैंकिंग सिस्टम में कैश की कमी (Liquidity) भी बरकरार है।

क्यों नहीं दिख रहा रुपए और लिक्विडिटी पर असर?

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा के ऐलान के मुताबिक, केंद्रीय बैंक ने अपनी विदेशी मुद्रा जमा (Foreign Currency Deposit) योजनाओं से $32 बिलियन जुटाए हैं। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण पूंजी प्रवाह (Capital Inflow) है। लेकिन, उम्मीद के मुताबिक, इस पैसे का असर न तो रुपए पर दिख रहा है और न ही बैंकिंग सिस्टम की नकदी पर।

रुपए की चाल और बाजार की चुनौतियाँ

इन इनफ्लोज़ के बावजूद, भारतीय रुपया मई के अपने रिकॉर्ड निचले स्तरों से केवल 3% ही सुधरा है। यह 2013 के हालात से बिल्कुल अलग है, जब इसी तरह की जमा योजनाओं से रुपए में 10% से ज्यादा की तेजी आई थी। मौजूदा समय में पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों (Geopolitical Tensions) ने बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है। इस दबाव को संभालने के लिए, आरबीआई लगातार बाजार में डॉलर बेच रहा है। नतीजतन, ये जमा इनफ्लोज़ रुपए को सीमित सहारा दे पा रहे हैं। Barclays के एनालिस्ट्स का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़त का असर रुपए पर बना हुआ है।

फॉरेन एसेट्स के आंकड़ों में गड़बड़?

5 जून को घोषणा के बाद से 17 जुलाई तक आरबीआई के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि विदेशी मुद्रा संपत्ति (Foreign Currency Assets) में केवल $7.6 बिलियन की वृद्धि हुई है। यह कुल जुटाए गए $32 बिलियन से काफी कम है। इसका मुख्य कारण यह हो सकता है कि बैंक इन जमाओं को केंद्रीय बैंक के साथ कब स्वैप (Swap) करते हैं। बाजार के जानकारों का कहना है कि आरबीआई शायद इन इनफ्लोज़ का इस्तेमाल अपनी नेट शॉर्ट फॉरवर्ड पोजीशन (Net Short Forward Position) को कम करने के लिए कर रहा है। या फिर, कमर्शियल बैंक इन पैसों का इस्तेमाल आगामी कूपन पेमेंट्स (Coupon Payments) के लिए हेजिंग (Hedging) करने में कर रहे हैं, बजाय इसके कि ये सीधे केंद्रीय बैंक की विदेशी संपत्ति का हिस्सा बनें।

बैंकिंग सिस्टम की नकदी पर असर

विदेशी मुद्रा के इनफ्लो के बावजूद, बैंकिंग लिक्विडिटी दबाव में बनी हुई है। आरबीआई एक तरफ रेपो ऑपरेशन (Repo Operations) के ज़रिए लिक्विडिटी मैनेज कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ रुपए को अत्यधिक कमजोर होने से बचाने के लिए फॉरेक्स मार्केट में दखल दे रहा है। इस दोहरी भूमिका के चलते सिस्टम में कैश की तंगी बनी हुई है। PGIM India Mutual Fund के एक्सपर्ट्स का कहना है कि FCNR (Foreign Currency Non-Resident) इनफ्लोज़ का लिक्विडिटी की कमी को दूर करने में अब तक कोई खास असर नहीं हुआ है। इसका कारण आरबीआई का सक्रिय करेंसी मैनेजमेंट ऑपरेशन और लोगों के पास नकदी में बढ़त है। हालांकि Axis Mutual Fund जैसे कुछ मार्केट पार्टिसिपेंट्स का मानना है कि आने वाले महीनों में लिक्विडिटी में धीरे-धीरे सुधार हो सकता है, लेकिन फिलहाल इसका असर बहुत कम है।

निवेशकों और बाजार पर नजर रखने वालों को आरबीआई के साप्ताहिक विदेशी मुद्रा रिजर्व डेटा और लिक्विडिटी मैनेजमेंट अपडेट पर ध्यान देना चाहिए। केंद्रीय बैंक अपनी फॉरवर्ड पोजीशन को कैसे एडजस्ट करता है और ऊर्जा आयात लागत के कारण डॉलर की मांग कितनी बनी रहती है, यह तय करेगा कि ये इनफ्लोज़ अंततः रुपए और घरेलू मनी मार्केट में व्यापक स्थिरता ला पाएंगे या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.