मॉनेटरी पॉलिसी पर 'सोच-समझकर' उठाने वाले कदम
सूत्रों के मुताबिक, RBI पुराने तेल संकटों के दौरान उठाए गए अचानक फैसलों से दूरी बनाएगा। मौजूदा अनुमानों के अनुसार, केंद्रीय बैंक 25 से 75 बेसिस पॉइंट तक की ब्याज दरें बढ़ा सकता है। इस रणनीति का मकसद घरेलू विकास को बनाए रखना है, खासकर सप्लाई-साइड इन्फ्लेशन से लड़ते हुए। RBI यह भी मानता है कि कच्चे तेल जैसी बाहरी वजहों से बढ़ने वाली महंगाई पर ऊंची ब्याज दरों का असर सीमित होता है।
2013 से मजबूत है इकोनॉमी
अच्छी खबर यह है कि भारत की इकोनॉमी 2013 के मुकाबले आज कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में है। करंट अकाउंट डेफिसिट 2% से भी नीचे है, जो 2013 के 4.8% के मुकाबले एक बड़ी राहत है। साथ ही, फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (विदेशी मुद्रा भंडार) लगभग $700 बिलियन तक पहुंच गया है। यह RBI को करेंसी में गिरावट को रोकने के लिए लक्षित हस्तक्षेप (targeted market interventions) करने की सहूलियत देता है, जिससे ग्रोथ को नुकसान पहुंचाने वाली व्यापक ब्याज दर बढ़ोतरी की जरूरत कम हो जाती है। अब फोकस सिर्फ ब्याज दरों के अंतर पर नहीं, बल्कि करेंसी को स्थिर रखने के दूसरे तरीकों पर भी है।
संभावित जोखिम और चिंताएं
इन मजबूती के बावजूद, कुछ चिंताएं बनी हुई हैं। औद्योगिक कंपनियों पर मार्जिन का दबाव जारी है। वहीं, सरकारी नियंत्रण और लिक्विडिटी मैनेजमेंट (तरलता प्रबंधन) से पॉलिसी में अनिश्चितता बढ़ सकती है, जो लॉन्ग-टर्म निवेश को हतोत्साहित कर सकती है। अगर फाइनेंशियल ईयर 27 (FY27) में कच्चे तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल के पार चली गईं, तो महंगाई तेजी से बढ़ सकती है और RBI को अपनी पॉलिसी बदलनी पड़ सकती है। बैंक भले ही अभी स्थिर दिख रहे हों, लेकिन कम महंगाई और स्थिर ग्रोथ वाले माहौल से हटकर, कंज्यूमर-फोकस्ड सेक्टर्स में कर्ज चुकाने (debt servicing) का जोखिम बढ़ सकता है। अगर करेंसी को बचाने के लिए डोमेस्टिक लिक्विडिटी पर फोकस कम हुआ, तो क्रेडिट टाइटनिंग (उधार मिलना मुश्किल) और ग्रोथ पर असर पड़ सकता है।
भविष्य का नज़रिया
मार्केट में अभी भी उतार-चढ़ाव बने रहने की उम्मीद है। ग्रोथ की रफ्तार 6-6.5% तक धीमी होने का अनुमान है, जो काफी हद तक एनर्जी सप्लाई की स्थिरता पर निर्भर करेगा। भविष्य में, RBI रुपये को सपोर्ट करने के लिए बेंचमार्क ब्याज दरों के अलावा, सॉवरेन बॉन्ड स्कीम और एनआरआई डिपॉजिट जैसे तरीकों पर ज्यादा ध्यान दे सकता है। निवेशकों को कंज्यूमर और प्रोड्यूसर प्राइस इन्फ्लेशन के बीच के गैप पर नजर रखनी चाहिए; अगर यह गैप बढ़ता है, तो यह संकेत हो सकता है कि मौजूदा पॉलिसी बफर अपनी सीमा के करीब पहुंच रहे हैं।
