भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम को उम्मीद से काफी कम यानी सिर्फ $5-6 अरब का ही सहारा मिला है। मार्केट को शुरुआत में $70 अरब तक के इनफ्लो की उम्मीद थी। अमेरिका में बढ़ी ब्याज दरें और कुछ ऑपरेशनल दिक्कतें इसकी मुख्य वजह बताई जा रही हैं।
RBI की FCNR(B) स्कीम से कलेक्शन उम्मीद से घटा
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम लॉन्च की थी, लेकिन इसका रिस्पॉन्स ठंडा रहा। Barclays की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस स्कीम के जरिए लगभग $5-6 अरब ही जमा हो पाए हैं। यह आंकड़ा मार्केट के शुरुआती अनुमानों से काफी कम है, जिनमें $40 अरब से लेकर $70 अरब तक के इनफ्लो की उम्मीद जताई गई थी।
इनफ्लो कम रहने की वजहें
मार्केट की उम्मीदें 2013 में RBI की ऐसी ही एक स्कीम की सफलता से प्रेरित थीं। हालांकि, मौजूदा ग्लोबल फाइनेंशियल माहौल काफी अलग है। अमेरिका में बढ़ी हुई ब्याज दरों (Interest Rates) के चलते वहां निवेश के बेहतर विकल्प मौजूद हैं, जिससे नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) के लिए भारतीय रुपये या विदेशी करेंसी में जमा प्रोडक्ट में पैसा लगाना कम आकर्षक हो गया है।
इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि GIFT City में लीवरेज्ड स्ट्रक्चर्स के इस्तेमाल जैसी इम्प्लीमेंटेशन की दिक्कतें संभावित निवेशकों के लिए प्रक्रिया को धीमा कर सकती हैं। इन ऑपरेशनल मुश्किलों ने स्कीम को उतनी बड़ी सफलता हासिल करने से रोका जितनी उम्मीद थी।
रुपये और बैलेंस ऑफ पेमेंट्स पर असर
भले ही FCNR(B) स्कीम से इनफ्लो उम्मीद से कम रहा हो, Barclays का मानना है कि RBI के अन्य कदमों से भारत का ओवरऑल बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (Balance of Payments) मजबूत बना हुआ है। इन सपोर्ट के बावजूद, भारतीय रुपये पर दबाव बना हुआ है।
निवेशकों को ध्यान देना चाहिए कि रुपये के आउटलुक पर अभी भी सावधानी की जरूरत है। मध्य-पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें आयात को महंगा बना रही हैं। जैसे-जैसे डॉलर की मांग बढ़ेगी, रुपये पर दबाव जारी रहने की उम्मीद है। ब्रोकरेज के मुताबिक, इसमें धीरे-धीरे गिरावट (Depreciation) का ट्रेंड देखने को मिल सकता है।
आगे चलकर, मार्केट के लिए मुख्य बात यह होगी कि RBI इन बाहरी दबावों के बीच करेंसी की अस्थिरता (Volatility) को कैसे मैनेज करता है। FCNR(B) स्कीम से वह बड़ी लिक्विडिटी नहीं मिली जिसकी कुछ लोगों को उम्मीद थी, लेकिन अब फोकस RBI के अन्य उपायों, फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व मैनेजमेंट और ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स के ट्रेंड पर रहेगा, जो विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स की अट्रैक्टिवनेस तय करते हैं।
