रुपया दबाव में, RBI की नई चाल
भारतीय रुपया इन दिनों भारी दबाव में है। डॉलर के मुकाबले यह रिकॉर्ड निचले स्तर को छूकर ₹95.33 तक पहुंच गया है, जिससे यह एशिया की सबसे कमजोर करेंसी में से एक बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह दबाव आगे भी जारी रह सकता है और रुपया ₹95-100 या FY27 के अंत तक ₹96 तक गिर सकता है। इसकी मुख्य वजहें हैं - बढ़ता ट्रेड डेफिसिट (आयात-निर्यात का घाटा), कच्चे तेल की ऊंची कीमतें (ब्रेंट क्रूड $100 के पार और $115 तक जा पहुंचा है), और विदेशी निवेशकों का भारी मात्रा में पैसा निकालना। मार्च और अप्रैल 2026 में ही इक्विटी से $19 अरब का आउटफ्लो हुआ है। इन सबके चलते देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी $728 अरब के ऊपरी स्तर से घटकर करीब $698 अरब रह गया है।
विदेशी बॉन्ड से आएगा पैसा?
इस स्थिति से निपटने के लिए RBI सरकारी बैंकों से करीब 5 साल की मैच्योरिटी वाले विदेशी करेंसी बॉन्ड जारी कराने की सोच रहा है। इस कदम से देश में जरूरी विदेशी पूंजी आएगी। यह रणनीति 2000 में SBI द्वारा लाए गए 'इंडिया मिलेनियम डिपॉजिट्स' (IMD) जैसी पिछली सफल पहलों की याद दिलाती है, जिससे $5.5 अरब जुटाए गए थे।
करेंसी जोखिम और बाजार का मिजाज
बॉन्ड जारी करने वाले बैंकों को करेंसी के जोखिम से बचाने के लिए RBI विदेशी मुद्रा स्वैप (Forex Swaps) की सुविधा देने पर भी विचार कर रहा है। इससे बैंक निवेशकों को बेहतर रिटर्न दे सकेंगे। हालांकि, मौजूदा ग्लोबल माहौल काफी जटिल है। हालांकि 2026 में उभरते बाजारों के डेट (Debt) के लिए अच्छी उम्मीदें हैं, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव और कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव से काफी वोलेटिलिटी (अस्थिरता) आ सकती है। इससे क्रेडिट स्प्रेड बढ़ सकते हैं और डॉलर मजबूत हो सकता है, जिसका असर उभरते बाजारों की करेंसी पर पड़ता है। फिलहाल, भारत के 10 साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड करीब 7.05% और सॉवरेन डेट यील्ड करीब 2.63% हैं। इस नए बॉन्ड इश्यू की सफलता काफी हद तक निवेशकों के सेंटीमेंट पर निर्भर करेगी।
चिंताएं और आगे का रास्ता
इस कदम को लेकर कुछ चिंताएं भी हैं। यह दिखाता है कि शायद भारत सीधे तौर पर विदेशी निवेश को आकर्षित करने में थोड़ा पीछे रह रहा है और अब बाहरी फंडिंग की कमी को पूरा करने के लिए 'इंजीनियर्ड इनफ्लो' पर निर्भर होना पड़ रहा है। यह एक ऐसी रणनीति लग रही है जो मौजूदा वित्तीय खामियों को दूर करने के लिए है, न कि बाहरी वित्तपोषण की कमजोरियों का स्थायी समाधान। RBI के पास फॉरेक्स स्वैप जैसे टूल हैं, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल और पूंजी के लगातार आउटफ्लो के बीच इनकी प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ सकते हैं। खासकर सरकारी बैंकों पर यह जिम्मेदारी डालने से यह भी लगता है कि प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों की ओर से उतनी रुचि नहीं है। 2000 के IMD की सफलता एक अलग आर्थिक माहौल में और नॉन-रेजिडेंट इंडियंस को टारगेट करके मिली थी। मौजूदा एनालिस्ट्स का अनुमान है कि रुपया ₹95-100 या ₹96 तक कमजोर हो सकता है। RBI का मुख्य फोकस वोलेटिलिटी को मैनेज करना है, न कि किसी खास एक्सचेंज रेट को बचाना, और इसके लिए वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करेगा। अगर बाहरी दबाव कम नहीं हुआ तो रुपया लंबे समय तक कमजोर रह सकता है।
