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RBI की बड़ी राहत! एक्सपोर्टर्स को मिला 450 दिन का क्रेडिट, शिपिंग संकट से निपटने में मिलेगी मदद

ECONOMY
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
RBI की बड़ी राहत! एक्सपोर्टर्स को मिला 450 दिन का क्रेडिट, शिपिंग संकट से निपटने में मिलेगी मदद
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारतीय एक्सपोर्टर्स को बड़ी राहत दी है। केंद्रीय बैंक ने प्री-शिपमेंट (pre-shipment) और पोस्ट-शिपमेंट (post-shipment) फाइनेंस के लिए बढ़ी हुई एक्सपोर्ट क्रेडिट अवधि को **30 जून 2026** तक बढ़ा दिया है। यह कदम पश्चिम एशिया संकट (West Asia crisis) के कारण शिपिंग में आ रही दिक्कतों के बीच एक्सपोर्टर्स को सहारा देने के लिए उठाया गया है।

RBI का बड़ा कदम: एक्सपोर्टर्स को मिली राहत, शिपिंग की दिक्कतें झेलने में मिलेगी मदद

पश्चिम एशिया (West Asia) में चल रहे संकट की वजह से वैश्विक शिपिंग (global shipping) में जो बाधाएं आ रही हैं, उन्हें देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक्सपोर्टर्स को बड़ी राहत दी है। केंद्रीय बैंक ने प्री-शिपमेंट (pre-shipment) और पोस्ट-शिपमेंट (post-shipment) फाइनेंस के लिए एक्सपोर्ट क्रेडिट की अवधि को 30 जून 2026 तक बढ़ा दिया है।

क्यों उठाया ये कदम?

इस फैसले के पीछे मुख्य वजह पश्चिम एशिया में उपजे तनाव से शिपिंग रूट्स (shipping routes) का प्रभावित होना है। कई जहाजों को अब केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) जैसे लंबे और महंगे रास्तों से गुजरना पड़ रहा है। इससे न सिर्फ डिलीवरी में काफी देरी हो रही है, बल्कि लॉजिस्टिक्स (logistics) की लागत भी तीन गुना तक बढ़ गई है। जानकारों का मानना है कि भारत के करीब 70% एक्सपोर्ट्स इन देरी और फंसे हुए कार्गो (stranded cargo) से जूझ रहे हैं। इसका असर सेरेमिक्स (ceramics) और इंजीनियरिंग (engineering) जैसे प्रमुख निर्यात उद्योगों पर पड़ रहा है, जिन्हें परिचालन (operations) और लागत संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

क्या हैं नए नियम?

RBI ने एक्सपोर्ट फाइनेंस के लिए 450-दिन की बढ़ी हुई क्रेडिट अवधि की मोहलत को 30 जून 2026 तक लागू कर दिया है। यह सुविधा उन सभी डिस्बर्सल (disbursals) पर लागू होगी जो इस अवधि तक किए जाएंगे। इसके साथ ही, एक्सपोर्ट प्रोसीड्स (export proceeds) को प्राप्त करने की अवधि को 15 महीने तक बढ़ाने का पुराना नियम भी जारी रहेगा। यह नए दिशानिर्देश देश के सभी रेगुलेटेड लेंडर्स (regulated lenders), जैसे कि कमर्शियल बैंक (commercial banks), कोऑपरेटिव बैंक (cooperative banks) और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज़ (Non-Banking Financial Companies - NBFCs) पर लागू होंगे।

लेंडर्स के लिए क्या है मायने?

एक्सपोर्ट क्रेडिट की अवधि बढ़ने से बैंकों और अन्य लेंडर्स के एक्सपोर्ट रिस्क (export risks) पर एक्सपोजर (exposure) भी बढ़ जाता है। RBI इन लेंडर्स के प्रत्यक्ष (direct) और अप्रत्यक्ष (indirect) लिंकेज पर कड़ी नज़र रख रहा है। अगर शिपिंग और पेमेंट में देरी का सिलसिला जारी रहा, तो यह बैंकों की एसेट क्वालिटी (asset quality) को प्रभावित कर सकता है और एनपीए (NPA - Non-Performing Assets) की स्थिति बिगड़ सकती है। यह खास तौर पर छोटे और मझोले व्यवसायों (SMEs) के लिए चिंता का विषय है, जिनके पास लंबी पेमेंट साइकिल से निपटने के लिए पर्याप्त नकदी नहीं होती।

आगे क्या?

RBI का यह बार-बार एक्सपोर्ट क्रेडिट को बढ़ाना दर्शाता है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार (international trade) में चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। उम्मीद है कि भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) और शिपिंग संबंधी मुश्किलें जल्द ही खत्म होंगी, जिससे व्यापार एक बार फिर पटरी पर लौट सकेगा। RBI स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है और जरूरत पड़ने पर और हस्तक्षेप करने के लिए तैयार है।

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