RBI का मुश्किल फैसला
RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) 8 अप्रैल 2026 को होने वाली अपनी अगली बैठक में पॉलिसी रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला कर सकती है। यह उम्मीद मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड की कीमतों के $100 प्रति बैरल के पार बने रहने से उपजी है। इस बाहरी दबाव के चलते RBI के सामने दोहरी चुनौती है: एक ओर ग्रोथ को सहारा देना, और दूसरी ओर बढ़ती महंगाई को रोकना।
महंगाई का बढ़ता खतरा
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल सीधे तौर पर भारत जैसे एनर्जी इंपोर्ट करने वाले देश की लागत को बढ़ाता है। इससे करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) के बढ़ने और भारतीय रुपये के कमजोर होने का खतरा है। फ्यूल और ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ने से रिटेल महंगाई (CPI) RBI के 4% के टारगेट से ऊपर जा सकती है। गोल्डमैन सैक्स इसे 4.6% तक देख रहा है, जबकि कुछ अन्य एनालिस्ट 6% से अधिक का अनुमान जता रहे हैं।
ग्रोथ पर भी पड़ सकता है असर
घरेलू मांग अभी भी मजबूत दिख रही है, जिसका अंदाजा GST कलेक्शन और क्रेडिट ग्रोथ के आंकड़ों से लगाया जा सकता है (Morgan Stanley के अनुसार)। हालांकि, बाहरी दबाव के चलते FY26 के लिए GDP ग्रोथ के अनुमानों में कटौती की जा रही है। गोल्डमैन सैक्स ने अपना अनुमान घटाकर 5.9% कर दिया है, जबकि अन्य प्रोजेक्शन 6.2-6.5% के आसपास हैं। बाजार की स्थिति भी अस्थिरता दर्शा रही है, जहां निफ्टी 50 इंडेक्स लगभग 22,225 के स्तर पर ट्रेड कर रहा है।
वैश्विक परिदृश्य और भारत की स्थिति
दुनिया भर के कई इमर्जिंग मार्केट्स के सेंट्रल बैंक इसी तरह की महंगाई की मार झेल रहे हैं। भारत की स्थिति कुछ हद तक इसलिए बेहतर है क्योंकि वह नेट फूड एक्सपोर्टर है, जो फूड इन्फ्लेशन के खिलाफ एक बफर का काम करता है। लेकिन, अपनी 85% क्रूड ऑयल की जरूरतें इंपोर्ट करने वाला देश होने के नाते, भारत भू-राजनीतिक सप्लाई में रुकावटों के प्रति बेहद संवेदनशील है।
आर्थिक आउटलुक के जोखिम
अगर मिडिल ईस्ट का संघर्ष लंबा खिंचता है, तो तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिससे महंगाई और GDP ग्रोथ पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है। Bernstein जैसी फर्मों ने तो डबल-डिजिट महंगाई और ग्रोथ के 2-3% तक सिमट जाने जैसे गंभीर परिदृश्यों की चेतावनी दी है। ऐसी स्थिति में RBI को ब्याज दरें बढ़ाने पर भी मजबूर होना पड़ सकता है, जो रिकवरी की राह मुश्किल बना देगा। गोल्डमैन सैक्स ने इंडियन इक्विटीज को 'मार्केटवेट' रेटिंग दी है और 2026 और 2027 के लिए कॉर्पोरेट अर्निंग्स ग्रोथ के अनुमानों में 9% तक की कटौती की है। इसके अलावा, सरकार पर फ्यूल और फर्टिलाइजर जैसी सब्सिडी पर खर्च बढ़ने से फिस्कल डेफिसिट का दबाव भी बढ़ सकता है।
आगे क्या?
RBI आगे चलकर एक सतर्क रुख अपनाएगा और महंगाई के दबावों व बाहरी झटकों पर बारीकी से नजर रखेगा। 5.25% की मौजूदा पॉलिसी रेट पर फिलहाल एक लंबी 'पॉज़' की उम्मीद है। RBI अपनी अगली चाल अर्थव्यवस्था पर मौजूदा संघर्षों के असर को स्पष्ट होने के बाद ही तय करेगा। उम्मीद है कि आने वाले फाइनेंशियल ईयर में महंगाई 4-5% के दायरे में रह सकती है, जो काफी हद तक ग्लोबल एनर्जी प्राइस पर निर्भर करेगा। बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहने की आशंका है, जिसमें फॉरेन इन्वेस्टर आउटफ्लो और कमोडिटी की ऊंची कीमतें दबाव बना सकती हैं। RBI लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए ओपन मार्केट ऑपरेशंस जैसे टूल्स का इस्तेमाल जारी रखेगा।