करेंसी बचाने का RBI का पैंतरा
1 जून को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले ₹94.97 पर मामूली सुधरा, जो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के एक सुनियोजित, लेकिन नाजुक बचाव को दर्शाता है। हालांकि बाजार सहभागियों ने करेंसी में थोड़ी स्थिरता देखी, यह स्थिरता RBI के लगातार हस्तक्षेप का नतीजा है, न कि किसी फंडामेंटल सुधार का। एनालिस्ट्स का मानना है कि RBI रणनीतिक फॉरवर्ड पोजीशन का उपयोग कर रहा है—संभवतः जून से अगस्त 2027 तक शॉर्ट पोजीशन को रोलओवर करके—ताकि विदेशी मुद्रा भंडार को तुरंत कम किए बिना लिक्विडिटी को मैनेज किया जा सके। यह कदम महत्वपूर्ण है क्योंकि मई के अधिकांश समय में करेंसी 95-96 की रेंज में काफी गिरावट के दबाव में रही है।
भू-राजनीति और महंगाई का डबल अटैक
बाजार की धारणा मध्य-पूर्व में जारी तनाव से काफी प्रभावित है, जहाँ ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगातार $93 प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। एक ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए जो अपनी लगभग 90% कच्चे तेल की ज़रूरतें आयात करती है, ऊर्जा की यह ऊंची कीमत सिर्फ एक वित्तीय बोझ नहीं है; यह सीधे तौर पर महंगाई को बढ़ावा दे रही है। अमेरिका-ईरान के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव एक रिस्क प्रीमियम बना रहा है जो चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर दबाव डाल रहा है। ऐसे में RBI को विकास दर और करेंसी की स्थिरता के बीच लगातार संतुलन बनाए रखना पड़ रहा है। मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की 3-5 जून की बैठक से पहले, चुनौती घरेलू विकास को बनाए रखते हुए इन बाहरी सप्लाई-साइड झटकों को मैनेज करना है।
संस्थागत फ्लो का दबाव
रुपये पर वर्तमान दबाव कैपिटल फ्लो में एक संरचनात्मक बदलाव से और बढ़ गया है। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) ने भारतीय इक्विटी में अपना निवेश आक्रामक रूप से कम किया है, 2026 में कुल ₹2.25 लाख करोड़ की निकासी हुई है। यह पलायन, जो पहले से ही 2025 के कुल वार्षिक बहिर्वाह से अधिक है, कमजोर घरेलू कॉर्पोरेट आय और दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे अन्य एशियाई बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) संचालित रैलियों के आकर्षण का मिला-जुला नतीजा है। हालांकि घरेलू संस्थागत खरीद ने कुछ हद तक सहारा दिया है, लेकिन विदेशी बिकवाली की भारी मात्रा ने इस समर्थन को काफी हद तक बेअसर कर दिया है, जिससे भारतीय सूचकांक वैश्विक मैक्रो हेडविंड्स के प्रति संवेदनशील हो गए हैं।
नीतिगत दुविधा
आगामी MPC घोषणा को देखते हुए, रेपो रेट 5.25% पर यथावत रहने की उम्मीद है। करेंसी के दबाव के बावजूद, अर्थशास्त्री मानते हैं कि RBI रुपये का बचाव करने के लिए आक्रामक दर वृद्धि का सहारा नहीं लेगा, क्योंकि ऐसा कदम घरेलू क्रेडिट ग्रोथ को धीमा कर सकता है। इसके बजाय, समिति एक न्यूट्रल रुख को प्राथमिकता देने की उम्मीद कर रही है, जिसका ध्यान 2-6% की सीमा के भीतर महंगाई की उम्मीदों को प्रबंधित करने पर होगा। बाजार गवर्नर संजय मल्होत्रा के लिक्विडिटी मार्गदर्शन में बदलाव का संकेत देने या वर्तमान रक्षात्मक रुख बनाए रखने का इंतजार कर रहा है। लिक्विडिटी को कसने के किसी भी संकेत से बैंकिंग और रियल एस्टेट सेक्टरों में हलचल मच सकती है।
