फॉरेक्स रिजर्व पर बढ़ेगा दबाव?
RBI का यह फैसला साफ दिखाता है कि केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर कितनी गंभीर है। पहले जहां निर्यातकों को अपनी कमाई भारत लाने के लिए 15 महीने तक का वक्त मिलता था, वहीं अब यह अवधि घटाकर 9 महीने कर दी गई है। यह एक तरह से कंपनियों को अपनी विदेशी कमाई को जल्दी डॉलर में बदलकर भारत लाने का दबाव बनाने जैसा है।
रुपये को मजबूती, निर्यातकों पर बोझ?
मौजूदा समय में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों के पैसे निकालने के कारण रुपया लगातार दबाव में है। ऐसे में, RBI का यह कदम रुपये को सहारा देने का एक बड़ा दांव है। हालांकि, इस फैसले से जहां एक तरफ देश का बैलेंस ऑफ पेमेंट (Balance of Payment) सुधरने की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ निर्यातकों, खासकर कैपिटल-इंटेंसिव (Capital-Intensive) उद्योगों से जुड़े लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। कई एक्सपोर्टर्स पहले 15 महीने की मोहलत का इस्तेमाल अपने लंबे पेमेंट साइकिल को मैनेज करने के लिए करते थे। अब उन्हें कैश फ्लो (Cash Flow) की तंगी का सामना करना पड़ सकता है।
कॉम्पिटिशन पर असर का खतरा
यह भी चिंता का विषय है कि कहीं इससे भारतीय कंपनियों की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कॉम्पिटिशन (Competition) करने की क्षमता पर असर न पड़े। कुछ विदेशी खरीदार भारतीय कंपनियों के मुकाबले ज्यादा लंबी क्रेडिट टर्म्स (Credit Terms) की मांग कर सकते हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो सकता है। इसके अलावा, बैंकों को भी नियमों के अनुपालन की निगरानी के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ेगी, जिससे छोटे और मध्यम निर्यातकों पर बोझ बढ़ सकता है।
भविष्य की राह
RBI का यह कदम दर्शाता है कि केंद्रीय बैंक अब कोरोना काल की ढील वाली नीतियों से हटकर सख्त रुख अपना रहा है। आने वाले समय में RBI का फोकस रुपये को स्थिर रखने और साथ ही क्रेडिट फ्लो (Credit Flow) को बहुत ज्यादा टाइट होने से रोकने के बीच संतुलन बनाने पर रहेगा।
