भारत की आर्थिक ग्रोथ एक बड़ी मुश्किल में फंसी दिख रही है। कंपनियां भारी कर्ज क्षमता होने के बावजूद प्राइवेट निवेश करने से कतरा रही हैं, जिसकी मुख्य वजह मांग की अनिश्चितता है। वहीं, लोगों का बढ़ता कर्ज प्राइवेट खपत को तो बढ़ा रहा है, लेकिन यह आर्थिक विकास के लिए एक जोखिम भी पैदा कर रहा है।
आखिर क्यों कंपनियां कर रही हैं निवेश से परहेज?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत की इकोनॉमी में एक अजीब सी स्थिति बनी हुई है। एक तरफ जहां सरकार कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) को GDP के 3.2% तक ले गई है, जो पिछले ग्रोथ साइकल से काफी ज्यादा है, वहीं प्राइवेट कॉर्पोरेट इन्वेस्टमेंट (Private Corporate Investment) उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ रहा है। कॉर्पोरेट ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (Gross Fixed Capital Formation) घटकर GDP का सिर्फ 3.8% रह गया है, जबकि 2003-2008 के दौर में यह 6.4% से 6.8% के बीच हुआ करता था।
मजबूत बैलेंस शीट, फिर भी निवेश में हिचकिचाहट
आंकड़े बताते हैं कि भारतीय कंपनियां कर्ज (Debt) और कर्ज चुकाने की लागत (Debt Servicing Costs) के मामले में काफी मजबूत स्थिति में हैं। उनके ऊपर कर्ज का बोझ ऐतिहासिक रूप से कम है। लेकिन, नई बड़ी परियोजनाओं में पैसा लगाने की उनकी इच्छाशक्ति में कमी दिख रही है। रिपोर्ट का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह भविष्य में मांग (Demand Visibility) का साफ न होना है। जब तक कंपनियों को लंबे समय तक कंजम्पशन (Consumption) बढ़ने का भरोसा नहीं होगा, वे नई क्षमताएं (Capacity Expansion) बनाने की बजाय खर्चों को कंट्रोल करने और बैलेंस शीट को मजबूत रखने पर ही ध्यान देंगी।
कर्ज के सहारे चल रही है खपत
आम आदमी की आर्थिक स्थिति भी थोड़ी चिंताजनक है। प्राइवेट कंजम्पशन, जो GDP का 61.4% है, वह वेतन वृद्धि (Wage Growth) से ज्यादा कर्ज लेकर पूरा किया जा रहा है। पिछले तीन सालों में रियल वेज ग्रोथ (Real Wage Growth) सिर्फ 11.1% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ी है, जो 2000 के दशक की शुरुआत की हाई-टीन ग्रोथ रेट से काफी कम है। अब जब हाउसहोल्ड डेट (Household Debt) डिस्पोजेबल इनकम का 0.55 गुना हो गया है, तो यह खतरा मंडरा रहा है कि अगर कर्ज का बोझ और बढ़ा तो कंज्यूमर स्पेंडिंग इकोनॉमी के लिए ग्रोथ का भरोसेमंद जरिया नहीं रह जाएगी।
शेयर बाजार की वैल्यूएशन और असल ग्रोथ में अंतर
यह रिपोर्ट शेयर बाजार (Equity Market) के एक असामान्य ट्रेंड की ओर भी इशारा करती है। फिलहाल, मार्केट का फॉरवर्ड प्राइस-टू-अर्निंग्स (Forward P/E) और प्राइस-टू-बुक (P/B) वैल्यूएशन अपने ऐतिहासिक रेंज के टॉप थर्ड में बना हुआ है। यह कंपनियों की असल परफॉरमेंस से बिल्कुल अलग है, जहां रेवेन्यू ग्रोथ (Revenue Growth) घटकर 8.2% रह गई है। असल में, मौजूदा अर्निंग्स ग्रोथ (Earnings Growth) टॉप-लाइन रेवेन्यू बढ़ाने की बजाय अंदरूनी कॉस्ट-कटिंग (Cost-Cutting) उपायों से आ रही है।
एक सेल्फ-सस्टेनिंग साइकिल की ओर
निवेशकों के लिए, मौजूदा आर्थिक माहौल काफी जटिल तस्वीर पेश कर रहा है। भारत की बाहरी स्थिति (External Position) मजबूत है, जिसमें रिकॉर्ड सर्विस एक्सपोर्ट्स (Service Exports) GDP का 5.4% हैं और फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (Foreign Exchange Reserves) भी अच्छे हैं। हालांकि, फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) सिर्फ GDP का 0.2% है, जो काफी कम है। आगे चलकर, सरकारी निवेश से एक सेल्फ-सस्टेनिंग साइकिल (Self-Sustaining Cycle) में बदलने के लिए कई चीजें अहम होंगी। निवेशकों को प्राइवेट कैपिटल स्पेंडिंग, घरेलू आय में लगातार ग्रोथ और इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) के रुझानों पर नजर रखनी होगी। ये सब मिलकर ही मजबूत कॉर्पोरेट बैलेंस शीट को असल आर्थिक ग्रोथ में बदल पाएंगे।
