किसानों की कर्ज माफी का खेल: ग्रामीण भारत पर मंडराया बड़ा खतरा, क्रेडिट कल्चर पर भारी असर!

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
किसानों की कर्ज माफी का खेल: ग्रामीण भारत पर मंडराया बड़ा खतरा, क्रेडिट कल्चर पर भारी असर!
Overview

महाराष्ट्र सरकार की **₹35,000 करोड़** की कर्ज माफी योजना और बिहार के माइक्रोफाइनेंस नियमों ने ग्रामीण भारत में क्रेडिट कल्चर को लेकर चिंता बढ़ा दी है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये कदम लोन चुकाने की आदत को बिगाड़ सकते हैं।

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सरकारी योजनाओं का बढ़ता बोझ और ग्रामीण ऋण

महाराष्ट्र सरकार ने अपने चुनावी वादे को पूरा करते हुए करीब ₹35,000 करोड़ की महत्वाकांक्षी कर्ज माफी योजना का ऐलान किया है। इस योजना के तहत सितंबर 2025 तक की बकाया फसल कर्ज वाले करीब 50 लाख किसानों को राहत मिलेगी। योजना में ₹2 लाख तक की सीधी माफी और समय पर लोन चुकाने वाले किसानों को ₹50,000 का प्रोत्साहन भी शामिल है। वहीं, बिहार में भी माइक्रोफाइनेंस बॉरोअर की लिमिट तय करने जैसे नियमों ने ग्रामीण ऋण बाजार में एक और दबाव पैदा कर दिया है। पिछले एक दशक में, राज्य सरकारों द्वारा घोषित कर्ज माफी योजनाओं का कुल आंकड़ा लगभग ₹2.4 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो एक गंभीर वित्तीय चुनौती को दर्शाता है।

कृषि ऋणों में क्यों बढ़ रहा है NPA?

यह एक चौंकाने वाली बात है कि जहां भारतीय बैंकिंग सेक्टर का ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) सितंबर 2025 तक घटकर लगभग 2.1-2.2% के निम्न स्तर पर आ गया है, वहीं कृषि क्षेत्र का NPA चिंताजनक रूप से ऊंचा है। सितंबर 2024 तक, कृषि क्षेत्र का ग्रॉस एनपीए अनुपात 6.2% था, जो कुल बैंक क्रेडिट में इसके योगदान से कहीं ज्यादा है। सरकारी बैंकों (PSBs) की हालत प्राइवेट बैंकों की तुलना में ज्यादा खराब दिख रही है। उदाहरण के लिए, UCO बैंक ने 10.81% और बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने अप्रैल-जून 2025 तक 9.65% का कृषि लोन एनपीए दर्ज किया। महाराष्ट्र के सरकारी बैंकों में तो यह आंकड़ा 17% तक पहुंच गया है।

प्राइवेट बैंकों की स्थिति कैसी है?

वहीं, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने फाइनेंशियल ईयर 25 में अपना कृषि एनपीए 8.4% बताया, जबकि दिसंबर 2025 तक उसका कुल जीएनपीए 1.57% रहा। प्राइवेट सेक्टर के बड़े बैंक HDFC Bank ने FY25 में 3.8% कृषि एनपीए दिखाया और उसका समग्र संपत्ति गुणवत्ता मजबूत बनी रही, दिसंबर 2025 तक जीएनपीए 1.24% रहा। हालांकि, HDFC Bank के एग्री पोर्टफोलियो में मौसमी रूप से कुछ स्लिपेज (slippages) देखे गए, जिससे Q1 FY26 में इसका समग्र एनपीए थोड़ा बढ़कर 1.4% हो गया।

माइक्रोफाइनेंस सेक्टर पर दबाव

माइक्रोफाइनेंस संस्थान (MFI) क्षेत्र भी चुनौतियों का सामना कर रहा है। NBFC-MFIs के लिए ग्रॉस एनपीए मार्च 2026 तक घटकर 3.6% रहने का अनुमान है, जिसका मुख्य कारण राइट-ऑफ (write-offs) हैं। लेकिन, लोन बुक पर कुल दबाव FY26 तक लगभग 30% रहने की उम्मीद है। जून 2025 तक असेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) में 19% की बड़ी गिरावट आई, जो ₹1.4 लाख करोड़ रह गया। यह बॉरोअर की अत्यधिक उधारी और सख्त लेंडिंग नियमों का नतीजा है।

क्रेडिट कल्चर का क्षरण: एक गंभीर जोखिम

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और विभिन्न कार्य समूह लगातार कृषि ऋण माफी के खिलाफ चेतावनी देते रहे हैं, क्योंकि यह क्रेडिट अनुशासन को कमजोर करती है और 'मोरल हैजर्ड' (moral hazard) पैदा करती है। 2017-18 और 2018-19 में राज्य-स्तरीय माफी के बाद कृषि एनपीए का स्तर काफी बढ़ गया था। यहां तक कि 2017 में 6% से बढ़कर 2020 में SBI के कृषि एनपीए 16% तक पहुंच गए थे। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसी लोकलुभावन नीतियां ग्रामीण क्रेडिट कल्चर को स्थायी रूप से बदल सकती हैं और वित्तीय अनुशासन को बिगाड़ सकती हैं।

भविष्य की राह

जहां भारतीय बैंकिंग सेक्टर कुल मिलाकर ठीक कर रहा है, वहीं कृषि और ग्रामीण ऋण खंड अनोखी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। विश्लेषक बैंकिंग क्षेत्र के लचीलेपन के बारे में सतर्क आशावादी बने हुए हैं, लेकिन ग्रामीण भारत में क्रेडिट अनुशासन और राजकोषीय स्वास्थ्य पर इन नीतिगत निर्णयों के दीर्घकालिक निहितार्थों पर कड़ी नजर रख रहे हैं। मार्च 2026 तक, SBI का P/E लगभग 12.43 और HDFC Bank का लगभग 17.04 था।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.