विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की आर्थिक प्रगति नियमों की कमी और सरकारी प्रतिबद्धताओं में ढिलाई के कारण धीमी पड़ रही है। देश के 2047 तक के लक्ष्यों को पाने के लिए भरोसेमंद नीतियों से ही लंबे समय तक घरेलू और विदेशी निवेश संभव है।
सिर्फ ज़मीन, मेहनत और पैसा काफी नहीं!
भारत का 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का सफर सिर्फ ज़मीन, श्रम और पूंजी जैसे पारंपरिक कारकों पर निर्भर नहीं करता। बाज़ार के जानकार लगातार इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि बड़े पैमाने पर और लंबे समय तक पूंजी जुटाने के लिए 'भरोसा' एक बेहद ज़रूरी, मगर गायब चीज़ है।
भारत दुनिया भर का ध्यान खींच रहा है, लेकिन सरकारी फैसलों की भविष्यवाणी न कर पाना, स्थानीय और विदेशी दोनों कंपनियों के लिए एक बड़ी बाधा बना हुआ है।
मुश्किल नियम और टैक्स की स्थिरता
निवेशक अक्सर नियमों के भारी जाल और हज़ारों कानूनों को व्यापार में एक बड़ी रुकावट बताते हैं। हाल के सालों में प्रक्रियाओं को आसान बनाने की कोशिशों के बावजूद, कई नियम इतने सख्त हैं कि व्यापार करना मुश्किल हो जाता है।
निवेशक समुदाय के लिए चिंता का एक बड़ा मुद्दा टैक्स कानूनों की स्थिरता है। अतीत में हुए रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स विवादों ने वैश्विक पूंजी पर एक गहरी छाप छोड़ी है। एक ऐसा माहौल बनाने के लिए, जहां कंपनियां सिर्फ कुछ सालों के लिए नहीं, बल्कि दशकों के लिए निवेश की योजना बना सकें, लगातार और गैर-रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स नीतियों की ज़रूरत बताई जा रही है।
नियमों का पालन और प्रशासनिक दबाव
नियमों के पालन में 'आनुपातिकता' (Proportionality) उद्योग जगत के नेताओं के बीच चर्चा का एक अहम विषय है। हालांकि सरकार ने कुछ छोटी-मोटी कॉर्पोरेट गलतियों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने के कदम उठाए हैं, फिर भी नियमों का पालन न करने पर सख्त कानूनी कार्रवाई का डर कंपनियों को हतोत्साहित करता है।
इसके अलावा, टैक्स प्रशासन के रवैये को लेकर भी चिंता है, जहां आंतरिक कलेक्शन के लक्ष्यों को पूरा करने का दबाव कभी-कभी लंबे मुकदमेबाजी का कारण बन जाता है। जब सरकारी संस्थाएं उन मामलों में भी अपील करती हैं, जिनमें वे पहले ही निचली अदालतों में हार चुकी होती हैं, तो यह कंपनियों पर वित्तीय और समय का बोझ बढ़ाता है। इस तरह की प्रथाएं विवाद समाधान की प्रक्रिया को लंबा खींच देती हैं, जो कई सालों तक चल सकती है।
सरकारी योजनाओं और MSMEs पर असर
जब राज्य अपने वादे पूरे नहीं करता, तो भरोसा और भी डगमगा जाता है। प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं का भुगतान एक बड़ी चिंता का विषय है। उद्योग की रिपोर्टों से पता चलता है कि इन इंसेंटिव का असल भुगतान शुरुआती घोषणाओं से काफी पीछे चल रहा है, जिससे उन कंपनियों के कैश फ्लो और योजनाएं प्रभावित हो रही हैं जिन्होंने इन वादों के आधार पर निवेश किया था।
इसके अतिरिक्त, छोटी कंपनियां अक्सर सरकारी संस्थाओं और पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) से समय पर भुगतान न मिलने से जूझती हैं। चूंकि ये माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) कम मार्जिन पर काम करती हैं, इसलिए ऐसे भुगतान में देरी से उनकी लिक्विडिटी पर भारी दबाव पड़ सकता है।
अब भारत के लिए वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाए रखने के लिए भरोसा बढ़ाना, समय पर भुगतान सुनिश्चित करना और विवादों के समाधान को सरल बनाना ज़रूरी हो गया है।
