दुनिया AI के लिए तैयार नहीं: Pearson CEO
Pearson ग्लोबल के CEO, Omar Abbosh के अनुसार, दुनिया का कोई भी देश आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की वजह से नौकरी के बाजार में आने वाले भारी बदलावों के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा स्किल गैप्स (skill gaps) पहले से ही एक बड़ी समस्या थे, और AI के तेज़ी से इंडस्ट्री में आने से ये और बढ़ गए हैं। Abbosh ने साफ़ कहा, "कोई भी देश आज AI के लिए तैयार नहीं है"। उनका यह भी कहना है कि यह चुनौती सिर्फ उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विकसित देशों में भी यह समस्या देखी जा रही है।
भारत में वोकेशनल स्किल्स की भारी कमी
Omar Abbosh ने खास तौर पर भारत की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने एक अनुमान से कहीं ज़्यादा ग्लोबल शॉर्टेज (global shortage) यानी कमी की बात की, जो कि वोकेशनल स्किल्स (vocational skills) के क्षेत्र में है। इसमें कंस्ट्रक्शन वर्कर्स, इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर और मैकेनिक जैसे हुनरमंद प्रोफेशनल्स शामिल हैं। ये ऐसे काम हैं जिनकी ज़रूरत AI के आने के बाद भी बनी रहेगी, लेकिन इनकी कमी आज से ही महसूस की जा रही है।
हायरिंग प्रक्रिया में 'साइनलिंग फेलियर' का खतरा
Abbosh का मानना है कि AI-सक्षम दुनिया के लिए लोगों को तैयार करने के लिए सबसे पहले एजुकेटर्स (educators) यानी शिक्षकों को ट्रेनिंग देने पर ज़ोर देना होगा। उन्होंने लेबर मार्केट (labour market) में एक गंभीर "साइनलिंग फेलियर" (signalling failure) यानी संकेत देने में विफलता की स्थिति बताई है। इसमें कंपनियाँ ज़रूरी स्किल्स को पहचानने में संघर्ष कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ नौकरी तलाशने वाले AI का इस्तेमाल करके रिज्यूमे (resume) बना रहे हैं, जिन्हें फिर AI ही स्कैन कर रहा है। इस वजह से सही कैंडिडेट को ढूंढना और भी मुश्किल हो गया है। Pearson के रिसर्च के मुताबिक, सिर्फ अमेरिका में इस तरह के स्किल मिसमैच (skill mismatch) यानी कौशल बेमेल होने की वजह से हर साल $1.1 ट्रिलियन का नुकसान हो रहा है, जबकि यूके में यह £100 बिलियन तक पहुँच सकता है। इससे पता चलता है कि भविष्य की नौकरियों के लिए स्किल्स को सही ढंग से तैयार करने में कितनी बड़ी आर्थिक चुनौती शामिल है।