PLI स्कीम्स का बढ़ता दबदबा: मैन्युफैक्चरिंग को मिली नई रफ्तार
भारत की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम्स का असर अब साफ दिखने लगा है। दिसंबर 2025 तक इन स्कीम्स के तहत ₹28,748 करोड़ का फंड बांटा जा चुका है। इस बूस्टर डोज से ₹2.16 लाख करोड़ से ज़्यादा का इन्वेस्टमेंट आया है, जिसने प्रोडक्शन को ₹20.41 लाख करोड़ तक पहुंचाया है और एक्सपोर्ट्स को ₹8.3 लाख करोड़ के पार ले गया है। यह स्कीम सिर्फ नंबर्स बढ़ाने का ज़रिया नहीं है, बल्कि यह भारत को ग्लोबल वैल्यू चेन (Global Value Chain) में गहराई से जोड़ने और अहम सेक्टर्स में इम्पोर्ट सब्स्टीट्यूशन (Import Substitution) को बढ़ावा देने में एक अहम भूमिका निभा रही है।
सेक्टर-दर-सेक्टर शानदार परफॉरमेंस
PLI स्कीम का सबसे बड़ा फायदा इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में देखने को मिला है। फाइनेंशियल ईयर 2020-21 से मोबाइल फोन इम्पोर्ट में करीब 77% की कमी आई है, और अब डोमेस्टिक प्रोडक्शन 99% से ज़्यादा की डिमांड पूरी कर रहा है। सिर्फ असेंबलिंग नहीं, बल्कि प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) और डिस्प्ले मॉड्यूल जैसे अहम पार्ट्स भी भारत में बन रहे हैं, जिससे ग्लोबल सप्लाई नेटवर्क में भारत की पकड़ मजबूत हुई है।
फार्मा सेक्टर में भी बड़ा बूस्ट मिला है। PLI की मदद से 191 बल्क ड्रग्स (Bulk Drugs) अब भारत में ही बन रही हैं, जिससे करीब ₹1,785 करोड़ की इम्पोर्ट लागत बची है। डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन (Domestic Value Addition) 83.7% तक पहुंच गया है।
ऑटो सेक्टर में फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में ₹32,879 करोड़ की सेल्स दर्ज की गई है, जो इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और एडवांस्ड कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग में बढ़त दिखाती है। टेलीकॉम और नेटवर्किंग प्रोडक्ट्स के एक्सपोर्ट्स बेस ईयर की तुलना में छह गुना से ज़्यादा बढ़कर ₹21,033 करोड़ तक पहुंच गए हैं। फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में ₹9,200 करोड़ से ज़्यादा का इन्वेस्टमेंट आया है, जिसका लक्ष्य डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन बढ़ाना है। वहीं, सोलर मॉड्यूल PLI का लक्ष्य 48 GW की इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी तैयार करना है, जिसके लिए करीब ₹52,942 करोड़ की कमिटमेंट्स मिली हैं।
क्यों खास है यह रणनीति?
भारत की PLI स्ट्रैटेजी, अपने व्यापक सेक्टरल एप्रोच के साथ, ग्लोबल ट्रेंड्स से मेल खाती है, जहाँ कई देश डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और इन्वेस्टमेंट आकर्षित करने के लिए इंसेंटिव दे रहे हैं (जैसे अमेरिका का CHIPS Act)। भारत का प्रोग्राम खास इसलिए है क्योंकि यह एक साथ कई वैल्यू चेन में स्केल हासिल करने का लक्ष्य रखता है। ऐतिहासिक रूप से, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर्स में बड़ा ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) था; फाइनेंशियल ईयर 2017-18 में मोबाइल फोन इम्पोर्ट, एक्सपोर्ट से $3.3 बिलियन ज़्यादा था। PLI ने इस ट्रेंड को पलट दिया है। फार्मा सेक्टर में भी चीन से बल्क ड्रग्स इम्पोर्ट पर निर्भरता कम की जा रही है। यह सब 'चाइना प्लस वन' (China Plus One) स्ट्रैटेजी के साथ मिलकर भारतीय मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक बेहतरीन माहौल बना रहा है। हालांकि, सोलर प्रोडक्शन के लिए पॉलीसिलिकॉन जैसी रॉ मटेरियल की ग्लोबल कीमतों में अस्थिरता अभी भी जोखिम पैदा कर सकती है।
कुछ चिंताएं और चुनौतियां
सभी शानदार नंबर्स के बावजूद, कुछ चुनौतियां भी हैं। सोलर मॉड्यूल जैसे सेक्टर्स में फैसिलिटी कमीशनिंग में देरी और सप्लाई चेन की दिक्कतें सामने आई हैं, जो अवॉर्डीज़ (Awardees) के लिए वित्तीय जोखिम पैदा कर सकती हैं। स्कीम का एक जैसा इंसेंटिव स्ट्रक्चर हर सेक्टर की जरूरतों के हिसाब से फिट नहीं बैठता। उदाहरण के लिए, छोटे टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स हाई इन्वेस्टमेंट थ्रेशोल्ड (High Investment Threshold) के कारण बाहर रह जाते हैं।
नौकरी सृजन (Job Creation) के मामले में 14 लाख से ज़्यादा नौकरियों का दावा है, लेकिन कुछ एनालिसिस बताते हैं कि टेक्नोलॉजी-ड्रिवन सेक्टर्स में सीधी नौकरियां कम पैदा होती हैं। यह भी चिंता है कि कहीं कंपनियां सबसिडी (Subsidy) पर ज़्यादा निर्भर न हो जाएं, बजाय इसके कि वे ऑर्गेनिक कॉस्ट कॉम्पिटिटिवनेस (Organic Cost Competitiveness) हासिल करें। WTO रेगुलेशंस (WTO Regulations) सबसिडी को डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन से सीधे जोड़ने पर रोक लगा सकते हैं, जिससे इम्पोर्टेड कंपोनेंट्स पर निर्भरता बनी रह सकती है।
भविष्य की राह
भारत की मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षाओं का भविष्य पॉलिसी रिफाइनमेंट (Policy Refinement) और इंडस्ट्री-गवर्नमेंट कोलैबोरेशन (Industry-Government Collaboration) पर टिका है। बैकवर्ड इंटीग्रेशन (Backward Integration) और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को बेहतर बनाने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार PLI के साथ-साथ टैक्स बेनिफिट्स (Tax Benefits) और इंफ्रास्ट्रक्चर एन्हांसमेंट (Infrastructure Enhancements) जैसे वैकल्पिक सपोर्ट मैकेनिज्म (Support Mechanisms) भी तलाश रही है। डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग बेस को मजबूत करने और भारत को एक बड़ा ग्लोबल प्रोडक्शन हब बनाने का लक्ष्य जारी रहेगा।