नए इनकम टैक्स रिजीम का बोलबाला! 90% से ज़्यादा टैक्सपेयर्स ने चुना, जानें क्यों?

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
नए इनकम टैक्स रिजीम का बोलबाला! 90% से ज़्यादा टैक्सपेयर्स ने चुना, जानें क्यों?

असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए नए इनकम टैक्स रिजीम को अपनाने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। टैक्स एक्सपर्ट्स का मानना है कि 80% से 95% इंडिविजुअल टैक्सपेयर्स अब इसी रिजीम को चुन रहे हैं, जिसकी मुख्य वजह है आसान कंप्लायंस और ज़्यादा रिबेट। हालांकि, कुछ खास तरह के डिडक्शन वाले टैक्सपेयर्स के लिए पुराना रिजीम अभी भी फायदेमंद हो सकता है।

Detailed Coverage

नए रिजीम की ओर बढ़ा कारवां

असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए नए इनकम टैक्स रिजीम की ओर टैक्सपेयर्स का झुकाव तेज़ हो गया है। हालांकि सरकारी आंकड़े अभी आने बाकी हैं, लेकिन चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और बड़े टैक्स-फाइलिंग प्लेटफॉर्म्स के अनुमानों के मुताबिक, 80% से 95% इंडिविजुअल टैक्सपेयर्स ने पुराने टैक्स स्ट्रक्चर को छोड़ दिया है। यह ट्रेंड पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है, जहां सैलरीड क्लास के लिए यह सिम्पल रिजीम डिफॉल्ट पसंद बनता जा रहा है।

इस रिजीम की बढ़ती पॉपुलैरिटी का मुख्य कारण पिछले कुछ बजट में किए गए बदलाव हैं। खास तौर पर, सेक्शन 87A के तहत ज़्यादा रिबेट, बदली हुई टैक्स स्लैब्स और बढ़ाई गई स्टैंडर्ड डिडक्शन ने मिडिल-क्लास इनकम ग्रुप के लिए टैक्स का बोझ काफी कम कर दिया है। इसके अलावा, पुराने रिजीम में ज़रूरी इन्वेस्टमेंट प्रूफ जैसे रेंट रिसीट या इंश्योरेंस प्रीमियम डॉक्यूमेंट्स को जमा करने और मेंटेन करने की झंझट भी नए रिजीम में खत्म हो गई है।

क्यों कुछ टैक्सपेयर्स के लिए पुराना रिजीम अब भी बेहतर?

साफ-सुथरे और आसान कंप्लायंस के बावजूद, टैक्स प्रोफेशनल इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कुछ खास टैक्सपेयर्स के लिए पुराना टैक्स रिजीम अब भी मैथमेटिकली ज़्यादा फायदेमंद है। जिन लोगों के पास बड़े फाइनेंशियल कमिटमेंट्स हैं और जिन्हें डिडक्शन का फायदा मिलता है—जैसे हाउस रेंट अलाउंस (HRA), होम लोन इंटरेस्ट (सेक्शन 24) या चैप्टर VI-A के तहत पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) और लाइफ इंश्योरेंस प्रीमियम जैसे इन्वेस्टमेंट—वे अक्सर पुराने रिजीम में कम टैक्स चुकाते हैं। एक्सपर्ट्स की सलाह है कि ज़्यादा डिडक्शन वाले लोगों को दोनों रिजीम के तहत अपने कुल टैक्स लायबिलिटी की तुलना ज़रूर करनी चाहिए ताकि वे पोटेंशियल सेविंग्स से चूक न जाएं।

लॉन्ग-टर्म सेविंग्स पर असर?

सिर्फ टैक्स बचाने के अलावा, नए रिजीम में शिफ्ट होने से लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल प्लानिंग पर भी बहस छिड़ गई है। कुछ इंडस्ट्री ऑब्ज़र्वर्स को चिंता है कि नए रिजीम की सुविधा कहीं टैक्सपेयर्स को पारंपरिक टैक्स-सेविंग इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल करने से हतोत्साहित न कर दे। ELSS म्यूचुअल फंड या प्रोविडेंट फंड जैसे इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करने के टैक्स इंसेंटिव को खत्म करने से, यह रिस्क है कि कुछ लोग लॉन्ग-टर्म वेल्थ क्रिएशन के बजाय इमीडिएट हाई टेक-होम सैलरी को प्राथमिकता दे सकते हैं। एम्प्लॉयर्स और फाइनेंशियल एडवाइजर्स को अब कर्मचारियों को यह समझाने की ज़रूरत पड़ रही है कि वे जिस भी टैक्स रिजीम को चुनें, एक बैलेंस्ड इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो बनाए रखना ज़रूरी है।

जैसे-जैसे टैक्स फाइलिंग का सीजन आगे बढ़ेगा, इन्वेस्टर्स और टैक्सपेयर्स के लिए अगली बड़ी अपडेट सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस (CBDT) से आने वाले ऑफिशियल आंकड़े होंगे, जिनसे फाइनल एडॉप्शन रेट्स की पुष्टि होगी और विभिन्न इनकम ग्रुप्स में हुए बिहेवियरल बदलावों की जानकारी मिलेगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.