मैक्रोइकॉनॉमिक चिंताएं बढ़ीं
कच्चे तेल के दाम $100 प्रति बैरल के पार जाने से भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। मध्य-पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते तेल की सप्लाई को लेकर चिंताएं हैं, जिससे देश का करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ने और महंगाई (Inflation) को और हवा मिलने का खतरा है।
रुपये का कमजोर होना बना नई मुसीबत
बाजार में गिरावट की एक और बड़ी वजह रही भारतीय रुपये का कमजोर होना। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 3-हफ्ते के निचले स्तर पर पहुँच गया। कच्चे तेल के बढ़ते दामों के साथ-साथ रुपये का कमजोर होना, भारत के लिए इंपोर्ट को महंगा बनाता है और कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) पर दबाव डालता है। इससे इकोनॉमिक स्टेबिलिटी (Economic Stability) को लेकर भी चिंताएं बढ़ी हैं।
सेक्टर पर असर और विदेशी निवेशकों की सतर्कता
इस बिकवाली (Sell-off) का असर खासकर फाइनेंसियल (Financials) और ऑटो (Autos) सेक्टर पर देखा गया। Nifty Auto इंडेक्स 1.3% टूट गया। ICICI Bank और HDFC Bank जैसे बड़े बैंकों के शेयर्स भी गिरे, जिन्होंने बेंचमार्क इंडेक्स (Benchmark Indices) को नीचे खींचा। हालांकि, फार्मा (Pharmaceutical) स्टॉक्स ने कुछ सहारा दिया, जिससे सेक्टर इंडेक्स 2.3% चढ़ गया।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भी भारतीय मार्केट से दूरी बनाए रखी। अप्रैल महीने में ही उन्होंने करीब $4.3 बिलियन की बिकवाली की है, जिससे इस साल कुल निकासी (Outflows) $18.5 बिलियन तक पहुँच गई है। यह दिखाता है कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स (Global Investors) भारतीय एसेट्स (Assets) को लेकर सतर्क हैं।
ब्रोकरेज की डाउनग्रेड ने बढ़ाई चिंता
इस नकारात्मक माहौल को और हवा देते हुए, ब्रोकरेज फर्म HSBC ने भारतीय इक्विटी (Indian Equities) को 'Underweight' रेटिंग दी है। HSBC ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल कंपनियों के नजीजों (Earnings) पर भारी पड़ सकता है और अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो मौजूदा वैल्यूएशन्स (Valuations) को सही ठहराना मुश्किल होगा। HSBC का अनुमान है कि कच्चे तेल में 20% की बढ़ोतरी से अर्निंग ग्रोथ (Earnings Growth) के अनुमान में 1.5% की कमी आ सकती है।
