RBI पर दबाव: पूर्व गवर्नर का क्या है कहना?
पूर्व RBI गवर्नर, दुवुरी सुब्बाराव (Duvvuri Subbarao) ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को एक मुश्किल चौराहे पर खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा है कि रुपये को बाजार की ताकतों के हिसाब से तय होने देना चाहिए, खासकर जब कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे हैं और देश से पैसा बाहर जा रहा है। यह सलाह मौजूदा RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा (Sanjay Malhotra) के हालिया कदमों से बिल्कुल अलग है, जिन्होंने विदेशी मुद्रा बाजारों (Forex Markets) पर शिकंजा कसा है। RBI ने बैंकों की नेट ओपन पोजीशन की सीमा तय करने और कुछ डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स पर रोक जैसे कदम उठाए हैं, जिनका मकसद गिरावट को थामना है, लेकिन ये कदम फिलहाल बाहरी दबाव के खिलाफ एक अस्थायी ढाल ही साबित हो रहे हैं।
तेल और टेंशन: क्यों गिर रहा है रुपया?
भारतीय रुपया इस समय भारी दबाव में है। मई 2026 की शुरुआत में यह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94.28 के स्तर के करीब कारोबार कर रहा था। पिछले एक महीने में इसमें 1.96% की कमजोरी आई है, जबकि पिछले एक साल में यह 10.36% लुढ़क चुका है। इस साल अब तक लगभग 5% की गिरावट का मुख्य कारण मध्य पूर्व में बढ़ी भू-राजनीतिक टेंशन और उसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में आई उछाल को माना जा रहा है। 2026 में कच्चे तेल का औसत दाम $96 प्रति बैरल तक पहुंच गया है। भारत अपनी 85% से ज्यादा कच्चे तेल की जरूरतें आयात से पूरी करता है, ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। RBI ने स्पॉट और ऑफशोर बाजारों में डॉलर बेचकर सीधा हस्तक्षेप (Intervention) भी किया है, लेकिन यह रुपये की कमजोरी को रोकने में ज्यादा कामयाब नहीं हो पा रहा है।
अर्थव्यवस्था पर असर और आगे का अनुमान
जहां एशिया की कई दूसरी करेंसी (Currencies) फेडरल रिजर्व के रेट कट की उम्मीदों के चलते स्थिर या मजबूत दिख रही हैं, वहीं भारतीय रुपया कमजोर हुआ है। RBI का कहना है कि उसके हस्तक्षेप का मकसद अस्थिरता को कम करना है, न कि किसी खास स्तर को लक्षित करना। हालांकि, रुपये का प्रदर्शन कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। कच्चे तेल के ऊंचे दामों से भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit - CAD) काफी बढ़ने की आशंका है। बैंक ऑफ अमेरिका (Bank of America) का अनुमान है कि FY27 में यह $88 बिलियन (GDP का 2.1%) तक पहुंच सकता है, जो 'Fragile Five' दौर की याद दिलाता है। महंगाई (Inflation) भी एक बड़ी चिंता बनती जा रही है। ADB का अनुमान है कि ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की बढ़ती लागत से FY27 में महंगाई 6.9% तक जा सकती है। ADB ने FY2026-27 के लिए आर्थिक विकास दर का अनुमान घटाकर 6.3% और IMF ने 6.5% कर दिया है। ये बाहरी चुनौतियां अर्थव्यवस्था पर असर डाल रही हैं। विश्लेषकों के अनुमानों में थोड़ा अंतर है, लेकिन ज्यादातर, जैसे BMI और Reuters पोल, साल के अंत तक रुपया 95 प्रति डॉलर के आसपास रहने की उम्मीद कर रहे हैं। कुछ ग्लोबल बैंक 85-87 की रेंज का भी अनुमान लगा रहे हैं। यह एक बड़ी गिरावट के बजाय 'मैनेज्ड वीकनेस' (Managed Weakness) का संकेत देता है, बशर्ते RBI का हस्तक्षेप जारी रहे।
दखलअंदाजी पर सवाल
पूर्व गवर्नर सुब्बाराव की चेतावनी के बावजूद कि 'कैपिटल अकाउंट लिबरलाइजेशन (Capital Account Liberalization) माफिया में शामिल होने जैसा है—शुरू करना आसान, निकलना मुश्किल'—RBI की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। कुछ जानकारों का मानना है कि लगातार और आक्रामक दखलअंदाजी, जो फिलहाल नियंत्रण का एहसास देती है, विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) को खत्म कर सकती है और भविष्य के संकटों में RBI के विकल्पों को सीमित कर सकती है। खासकर, ऊंचे तेल के दाम और संभावित कैपिटल आउटफ्लो (Capital Outflows) के माहौल में, एक वैश्विक स्तर पर जुड़े वित्तीय सिस्टम में ऐसे पैंतरे कितने प्रभावी होंगे, इस पर संदेह है। क्षेत्रीय साथियों, जैसे ताइवान डॉलर या थाई बाथ, जो 2026 में मजबूत दिखे हैं, की तुलना में रुपये की कमजोरी संरचनात्मक मुद्दों को उजागर करती है। आयातित ऊर्जा पर निर्भरता और बाजार की ताकतों को समायोजित होने देने के बजाय हस्तक्षेप करने की पुरानी आदत, एक मजबूत मुद्रा प्रणाली के विकास में बाधा डाल सकती है। इसके अलावा, आर्थिक विकास को सहारा देने और महंगाई को नियंत्रित करने के बीच संतुलन बनाने की RBI की चुनौती मौद्रिक नीति (Monetary Policy) को मुश्किल बना रही है, जिससे ब्याज दरें बढ़ाना—जो एक प्रमुख हथियार है—एक अंतिम उपाय बन सकता है, जो गहरी आर्थिक परेशानियों का संकेत देगा।
आगे क्या? 'नियंत्रित कमजोरी' की उम्मीद
बाजार के प्रतिभागी आम तौर पर उम्मीद करते हैं कि भारतीय रुपया 2026 के अंत तक 95 प्रति डॉलर के आसपास बना रहेगा। RBI के सामने अस्थिरता को कम करने के लिए हस्तक्षेप करने और साथ ही बाजार-निर्धारित विनिमय दरों (Exchange Rates) का समर्थन करने की कठिन चुनौती है। भू-राजनीतिक जोखिमों और कमोडिटी (Commodity) की कीमतों पर उनके असर के कारण यह संतुलन साधना और मुश्किल हो गया है। इसका मतलब है कि रुपये का रास्ता एक स्पष्ट प्रवृत्ति के बजाय 'मैनेज्ड फ्लक्चुएशन' (Managed Fluctuations) वाला होने की संभावना है। केंद्रीय बैंक का लक्ष्य बाजार समायोजन में बाधा डाले बिना स्थिरता बनाए रखना है।
