US पर मंडराता खतरा
रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती ऊर्जा कीमतों (Energy Prices) के कारण अमेरिका में मंदी की आशंकाएं बढ़ रही हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी हुई है, उसका सीधा असर अमेरिकी इकोनॉमी पर पड़ा है और वह मंदी में चली गई है।
अमेरिका का एनर्जी शील्ड
लेकिन इस बार हालात थोड़े अलग हो सकते हैं। अमेरिका अब ऊर्जा के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर है और नेट एनर्जी एक्सपोर्टर बन गया है। इसका मतलब है कि तेल की ऊंची कीमतों का बोझ देश के अंदर ही संभाला जा सकता है, और बढ़ा हुआ खर्च देश की इकोनॉमी में ही घूमेगा। साथ ही, हाल ही में मिले बड़े टैक्स रिफंड (Tax Refunds) भी अमेरिकी परिवारों की आय बढ़ा रहे हैं, जो खपत (Consumption) को सहारा देकर किसी भी तत्काल गिरावट को कम कर सकते हैं।
भारत की आर्थिक मजबूती
एसबीआई रिसर्च का कहना है कि भारत वैश्विक अनिश्चितताओं का सामना करने के लिए अच्छी स्थिति में है। फाइनेंशियल ईयर 26 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.6 प्रतिशत रही और फाइनेंशियल ईयर 27 के लिए भी 6.5-6.8 प्रतिशत की मजबूत ग्रोथ का अनुमान है, जबकि दुनिया भर में आर्थिक सुस्ती छाई हुई है। इस मजबूती का मुख्य कारण है मजबूत घरेलू मांग, स्थिर बैंकिंग सेक्टर और साउंड फाइनेंशियल कंडीशंस।
भारत के लिए अप्रत्यक्ष दबाव
हालांकि, सीधी मार कम होने की उम्मीद है, लेकिन कुछ अप्रत्यक्ष असर चिंता का विषय हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से महंगाई (Inflation) बढ़ सकती है और वैश्विक व्यापार में बाधा आ सकती है, जो भारत की ग्रोथ को धीमा कर सकता है। ऐसे में, पॉलिसी मेकर्स को भुगतान संतुलन (Balance of Payments) को मैनेज करना होगा और बाहरी दबाव को कम करने के लिए रुपये को स्थिर रखना होगा।
