बढ़ते तेल दामों का बजट पर सीधा असर
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आई तूफानी तेजी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। यह न सिर्फ ईंधन और फर्टिलाइजर पर सरकारी सब्सिडी (Subsidy) का बोझ बढ़ा रही है, बल्कि सरकार को अपने बजट की रणनीति पर फिर से विचार करने पर मजबूर कर रही है। ऐसे में सरकार के सामने आर्थिक विकास (Economic Growth), महंगाई नियंत्रण (Inflation Control) और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के बीच मुश्किल संतुलन बनाने की चुनौती है।
सब्सिडी का बढ़ता बोझ, राजस्व पर खतरा
31 मार्च 2026 को ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) $106.73 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था, जो पिछले महीने में लगभग 37% बढ़ा है। वहीं, LNG की कीमतों में भी करीब दोगुनी बढ़ोतरी हुई है। इन सब का सीधा असर भारत के FY27 के बजट अनुमानों पर पड़ रहा है। ICRA के अनुमानों के अनुसार, अकेले फर्टिलाइजर सब्सिडी के मद में ₹40,000 करोड़ का अतिरिक्त खर्च आ सकता है। इसी तरह, LPG (LPG) पर होने वाले नुकसान में भी खासी बढ़ोतरी की उम्मीद है। सब्सिडी का यह बढ़ता बोझ सरकारी खजाने पर दबाव डाल रहा है, जबकि FY27 के लिए सरकार ने 4.3% फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) का लक्ष्य रखा है। FY27 के लिए सरकार का कुल सब्सिडी बिल ₹4.55 ट्रिलियन रहने का अनुमान है, जो FY26 के संशोधित अनुमानों से कम है, लेकिन अब इस आंकड़े के ऊपर जाने का काफी जोखिम है।
तेल कंपनियों पर दबाव और सरकारी आय में सेंध
देश की एनर्जी सेक्टर (Energy Sector) भारी दबाव महसूस कर रही है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) जैसी सरकारी तेल कंपनियों के मुनाफे (Profits) में कमी आ रही है। रिफाइनिंग (Refining) से होने वाला मुनाफा शायद पंप पर कम मार्जिन और LPG पर बढ़ते नुकसान की भरपाई न कर सके। UBS जैसे विश्लेषकों ने इन कंपनियों के लिए टारगेट प्राइस (Target Price) पहले ही नीचे कर दिए हैं। BPCL का TTM P/E रेशियो (Ratio) करीब 5.5x है, जबकि इसका RSI 34.785 'सेल' (Sell) का संकेत दे रहा है। ONGC का TTM P/E रेशियो लगभग 9.4x है और RSI 63.90 के आसपास है, जो 'मॉडरेटली ओवरवैल्यूड' (Modestly Overvalued) लेकिन खरीदने लायक रेंज में है। ऐतिहासिक रूप से, कच्चे तेल में $10 की बढ़ोतरी भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) को 0.3-0.4% तक बढ़ा सकती है। $100 प्रति बैरल के औसत कच्चे तेल की कीमत आयात बिल को $80 बिलियन यानी GDP का 2.1% बढ़ा सकती है। वर्तमान संघर्ष के कारण ब्रेंट क्रूड $118.43 तक पहुंच गया, जिससे देश के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) पर काफी असर पड़ा है, जो 2022 के तेल झटकों की याद दिलाता है।
बड़े खर्च और आर्थिक मंदी का खतरा
ऊर्जा की कीमतों में यह लगातार बढ़ोतरी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) का जोखिम पैदा कर रही है, जिसमें धीमी ग्रोथ के साथ महंगाई (Inflation) का सामना करना पड़ता है। FY27 के लिए 4.3% का फिस्कल डेफिसिट लक्ष्य अब काफी जोखिम में है, और अगर कीमतें ऊंची बनी रहीं तो यह 4.5% या उससे अधिक तक जा सकता है। इससे सरकार के लिए बजट घाटा कम करने और FY31 तक कर्ज-से-GDP अनुपात (Debt-to-GDP Ratio) को 50% तक लाने के लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल हो जाएगा। लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष भारत की क्रेडिट रेटिंग (Credit Rating) को डाउनग्रेड भी करा सकता है, जिससे उधार लेना महंगा हो जाएगा। इसके अलावा, भारत की आयात पर निर्भरता, जिसमें ~60% ऊर्जा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरती है, एक बड़ी कमजोरी है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों को कम करने के लिए सरकार को एक्साइज ड्यूटी में बड़ी कटौती करनी पड़ सकती है, जिससे हर ₹3 प्रति लीटर की कटौती पर ₹45,000-50,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान हो सकता है। यह नीति निर्माताओं को महंगाई प्रबंधन, बजट अनुशासन बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के बीच एक कठिन संतुलन बनाने पर मजबूर करता है। तेल कंपनियों के कम मुनाफे से कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन (Corporate Tax Collection) और सरकारी कंपनियों से मिलने वाले डिविडेंड (Dividend) में भी कमी आ सकती है, जिससे सरकारी आय पर और दबाव पड़ेगा।
आर्थिक विकास दर भी प्रभावित
ICRA के विश्लेषकों का अनुमान है कि उच्च ऊर्जा कीमतों और सप्लाई की चिंताओं के कारण FY27 में भारत की GDP ग्रोथ (GDP Growth) घटकर 6.5% रह सकती है, जो FY26 के अनुमानित 7.5% से कम है। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) धीमी ग्रोथ के बावजूद अपनी ब्याज दरें (Interest Rates) अपरिवर्तित रख सकता है। इस स्थिति में भारत को ऊर्जा आयात पर अपनी निर्भरता और ग्लोबल अस्थिरता का सामना करने के लिए अपने बजट की क्षमता का गंभीर पुनर्मूल्यांकन करना होगा। सरकार के नीतिगत फैसले ही यह तय करेंगे कि बजट में कितना बड़ा घाटा होगा और इसका अर्थव्यवस्था पर कितना व्यापक असर पड़ेगा।