Middle East में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और Brent Crude Oil के दाम $115 प्रति बैरल के महत्वपूर्ण स्तर को पार करने के कारण आज भारतीय शेयर बाजारों में बिकवाली का भारी दबाव देखा गया।
वैश्विक बाजारों से मिले मिले-जुले संकेतों के बीच, घरेलू सूचकांकों में भारी गिरावट आई। BSE सेंसेक्स 2,460 अंक यानी 3.1% गिरकर 76,449 पर कारोबार कर रहा था, वहीं Nifty 50 इंडेक्स 727 अंक यानी 3% टूटकर 23,715 पर आ गया। ब्रॉडर मार्केट सेगमेंट, जैसे Nifty Midcap 100 और Smallcap 100 भी 3.5% से अधिक गिरे। निवेशकों की घबराहट को मापने वाला India VIX, जिसे फियर गेज भी कहते हैं, 21% से अधिक उछलकर 24 के पार चला गया, जो बाजार में बढ़ी हुई आशंकाओं को दर्शाता है।
लगभग सभी सेक्टर लाल निशान में थे। Nifty PSU Bank इंडेक्स को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, जो लगभग 6% गिरा। इसके बाद Nifty Auto इंडेक्स 4.3% और Nifty Bank इंडेक्स 3.8% नीचे आया। इन सबके बीच, ONGC और Coal India के शेयर मामूली बढ़त के साथ कारोबार कर रहे थे। दूसरी ओर, InterGlobe Aviation (IndiGo) 8% से ज्यादा गिर गया, वहीं SBI, Shriram Finance और Maruti Suzuki जैसे शेयर भी 5% से अधिक टूटे।
बाजार की इस तत्काल प्रतिक्रिया के पीछे भारत की अर्थव्यवस्था के लिए गहरी चिंताएं हैं, खासकर तब जब देश कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक है। विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें देश की आर्थिक बुनियाद पर भारी दबाव डालेंगी। अनुमान है कि कच्चे तेल के दाम में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत के ट्रेड डेफिसिट को लगभग 30% बढ़ा सकती है और खुदरा महंगाई (retail inflation) में 49-58 बेसिस पॉइंट्स का इजाफा कर सकती है। ऐतिहासिक रूप से, कच्चे तेल की कीमतों में $10 प्रति बैरल की वृद्धि से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में 0.3-0.4% का इजाफा देखा गया है, जो परिवहन और निर्माण लागत में वृद्धि के कारण होता है। इससे चालू खाता घाटा (current account deficit) भी प्रभावित होगा, जिसमें $10 प्रति बैरल तेल की बढ़ोतरी से सालाना $15 बिलियन का अंतर आ सकता है।
वर्तमान बाजार परिदृश्य में वैल्यूएशन (valuations) का मिश्रण देखने को मिलता है। ऊर्जा उत्पादक कंपनियों जैसे ONGC का P/E रेश्यो लगभग 8-9 के आसपास है, जो उद्योग के औसत 9.87 से काफी कम है। वहीं, IndiGo जैसी एयरलाइन का P/E रेश्यो 39x से 59x तक है, जो ईंधन की बढ़ती लागत के साथ खतरनाक साबित हो सकता है। Maruti Suzuki का P/E रेश्यो लगभग 30-31 है, जो ऑटो उद्योग के औसत 21.6 से काफी ऊपर है। इतिहास गवाह है कि India VIX में बड़ी उछालें, जैसे 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस और 2020 की COVID-19 महामारी के दौरान देखी गई थीं, अक्सर बाजार में बड़ी गिरावट और निवेशक भय से जुड़ी रही हैं।
भारत की तेल पर निर्भरता, जो अपनी 85% खपत के लिए आयात पर निर्भर करता है, उसे तेल झटकों के प्रति और भी संवेदनशील बनाती है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जो भारत के लगभग 50% कच्चे तेल आयात का महत्वपूर्ण मार्ग है, पर किसी भी तरह की बाधा से तेल की कीमतों में और अधिक वृद्धि हो सकती है। एविएशन सेक्टर के लिए ईंधन लागत एक बड़ा हिस्सा है, जिससे IndiGo जैसी एयरलाइंस सीधे तौर पर प्रभावित होती हैं। ऑटो सेक्टर भी इनपुट लागतों में वृद्धि और उपभोक्ता मांग में संभावित कमी के दबाव का सामना करेगा, जिससे Maruti Suzuki जैसी कंपनियां प्रभावित हो सकती हैं। ऐसे में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने महंगाई नियंत्रण और आर्थिक विकास को संतुलित करने की एक बड़ी चुनौती होगी।
हालांकि पहले यह अनुमान लगाया गया था कि FY26 में भारत का चालू खाता घाटा GDP का लगभग 1% रहेगा, लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक संकट और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने इन अनुमानों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बढ़ती ऊर्जा लागत, सप्लाई चेन की चिंताएं और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच आने वाला समय चुनौतीपूर्ण रहने की उम्मीद है। निवेशक ऐसे शेयरों पर ध्यान दे सकते हैं जिनकी बैलेंस शीट मजबूत हो, ऊर्जा पर कम निर्भरता हो और मूल्य निर्धारण शक्ति (pricing power) हो। वैश्विक सुरक्षा चिंताओं के बीच रक्षा क्षेत्र में भी निवेशकों की रुचि बढ़ सकती है।