बाजार में क्यों है अस्थिरता का माहौल?
इस हफ्ते भारतीय शेयर बाजार में बड़ी उठापटक देखने को मिल सकती है। एक तरफ जहां कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों की मतगणना सोमवार से शुरू हो रही है, वहीं दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) की वजह से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह दोनों ही कारक घरेलू शेयर बाजार को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं।
तेल की कीमतें और रुपया हो रहे हैं बेहाल
विशेषज्ञों की नजरें खासकर कच्चे तेल की कीमतों पर टिकी हैं। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमत हाल के दिनों में $108 से $126 प्रति बैरल के बीच बनी हुई है। भारत अपनी 85% तेल जरूरतों को आयात से पूरा करता है, ऐसे में इन ऊंची कीमतों का सीधा असर महंगाई (Inflation) पर पड़ रहा है और भारतीय रुपया (Indian Rupee) भी कमजोर होकर नए रिकॉर्ड निचले स्तर 94.92-95.34 के करीब पहुंच गया है। इसने कंपनियों के मुनाफे (Corporate Profits) पर भी दबाव बनाया है।
चुनावों का असर और FPIs की बिकवाली
चुनावों के नतीजों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने अप्रैल में भी बिकवाली जारी रखी, हालांकि अप्रैल महीने में निफ्टी 50 (Nifty 50) इंडेक्स ने 5.8% की बढ़त हासिल की थी, लेकिन मौजूदा हालात इस तेजी पर भारी पड़ रहे हैं। निफ्टी 50 का मौजूदा प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो लगभग 20.9-21.02 के आसपास है, जो किसी भी बड़े झटके के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं छोड़ता।
आर्थिक मोर्चे पर मिली-जुली तस्वीर
हालांकि, इन जोखिमों के बीच कुछ सकारात्मक आर्थिक संकेत भी मिल रहे हैं। अप्रैल में HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI 55.9 और सर्विसेज PMI 57.9 रहा, जो दोनों क्षेत्रों में मजबूत वृद्धि का संकेत दे रहा है। इन सबके बावजूद, कच्चे माल और ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण इनपुट लागतें बढ़ी हैं। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) भी लगभग $703 बिलियन के मजबूत स्तर पर बना हुआ है।
आगे क्या हो सकता है?
बाजार के लिए मुख्य जोखिम कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी है, जो महंगाई को बढ़ाएगी और रुपये को और कमजोर करेगी। इससे घरेलू उपभोक्ताओं और आयातकों पर दबाव बढ़ेगा, साथ ही एनर्जी-इंटेंसिव सेक्टर और आयातित सामग्री पर निर्भर कंपनियों के मुनाफे घटेंगे। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव किसी भी समय स्थिति को और बिगाड़ सकता है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहने से बाजार में लिक्विडिटी (Liquidity) और करेंसी की स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
बाजार का कैसा रहेगा रुख?
आगे बाजार की चाल काफी हद तक खबरों पर निर्भर करेगी, खासकर अमेरिका-ईरान के बीच की स्थिति और तेल की कीमतों पर। जानकारों का मानना है कि अगर कूटनीतिक मोर्चे पर कोई सकारात्मक खबर आती है या तेल की कीमतों में गिरावट आती है, तो बाजार में शॉर्ट-कवरिंग रैलियां (Short-covering Rallies) देखने को मिल सकती हैं। वहीं, तनाव बढ़ने से गिरावट का खतरा बढ़ जाएगा। कुछ ब्रोकरेज फर्मों ने चुनिंदा शेयरों में तेजी की उम्मीद जताई है, लेकिन फिलहाल बाजार का मिजाज सतर्क बना हुआ है। उम्मीद है कि 2026 के मध्य तक आर्थिक संकेत बेहतर होने और नतीजों में सुधार होने पर बाजार में तेजी आ सकती है, लेकिन फिलहाल हफ्ते भर की अस्थिरता (Volatility) जारी रह सकती है।
