पिछले दो सालों से Nifty 50 इंडेक्स में ज़्यादातर समय एक जैसी चाल देखने को मिली है, यानी निवेशकों को ख़ास रिटर्न नहीं मिला। भले ही बाज़ार में काफी उतार-चढ़ाव रहा हो, लेकिन कुल मिलाकर पिछले 24 महीनों में बाज़ार ने ज़्यादातर निवेशकों को 'फ्लैट' रिटर्न ही दिया है। एडलवाइस म्यूचुअल फंड की एक एनालिसिस बताती है कि ऐसे ठहराव के दौर के बाद अक्सर बाज़ार में ज़ोरदार तेज़ी आती है।
बाज़ार के आंकड़े क्या कहते हैं?
पिछले दो सालों में भारतीय शेयर बाज़ार, जो Nifty 50 इंडेक्स से ट्रैक होता है, काफी हद तक सपाट रहा है। इंडेक्स ने रिकॉर्ड ऊंचाई को छुआ, लेकिन साथ ही तेज़ गिरावट और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का भी सामना किया। जो निवेशक 2024 की रैली के दौरान बाज़ार में आए, उनके पोर्टफोलियो में ज़्यादा ग्रोथ नहीं दिखी। एनालिस्ट्स इसे 'दो साल का राउंड ट्रिप' कह रहे हैं।
ठहराव क्यों हो सकता है फायदेमंद?
भले ही एक स्थिर बाज़ार निवेशकों को निराश कर सकता है, लेकिन अक्सर यह एक ज़रूरी काम करता है। एक सपाट बाज़ार कंपनियों की कमाई को शेयर की कीमतों के बराबर आने का मौका देता है। जब शेयर की कीमतें स्थिर रहती हैं और कंपनियों का मुनाफ़ा बढ़ता रहता है, तो वैल्यूएशन (मूल्यांकन) ज़्यादा उचित स्तर पर आ जाते हैं। इसे बाज़ार के लिए एक स्वस्थ रीसेट माना जाता है।
हालिया आंकड़े बताते हैं कि लार्ज-कैप स्टॉक्स फिलहाल अपने सात साल के औसत वैल्यूएशन से नीचे कारोबार कर रहे हैं। मिड-कैप स्टॉक्स के वैल्यूएशन अपने लॉन्ग-टर्म एवरेज पर आ गए हैं, हालांकि स्मॉल-कैप स्टॉक्स अभी भी थोड़े ऊंचे स्तर पर हैं। वैल्यूएशन में यह कमी, मुनाफे से ज़्यादा तेज़ कीमतों वाली अवधि की तुलना में भविष्य में ग्रोथ के लिए एक मज़बूत आधार प्रदान करती है।
2013 से अलग है मौजूदा आर्थिक माहौल
कुछ निवेशक मौजूदा बाज़ार की तुलना 2013 के 'टेपर टैंट्रम' (taper tantrum) दौर से कर रहे हैं, जब ग्लोबल लिक्विडिटी (पूंजी की उपलब्धता) कम हो गई थी और उभरते बाज़ारों पर भारी दबाव आया था। हालांकि, फाइनेंशियल एनालिसिस से पता चलता है कि वर्तमान माहौल संरचनात्मक रूप से अलग है। 2013 का दौर ऊँची महंगाई, बड़े करंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाते का घाटा) और बैंकों की खराब बैलेंस शीट (ज़्यादा NPA) से पहचाना जाता था।
इसके विपरीत, आज भारतीय अर्थव्यवस्था में महंगाई दर कम है, ग्रोथ मज़बूत है और बैंकों की बैलेंस शीट बेहतर हुई है। ये कारक बताते हैं कि 2013 के संकट की तुलना में बाज़ार की अंदरूनी सेहत आज ज़्यादा मज़बूत है। हालांकि, बाज़ार चुनौतियों से अछूता नहीं है।
जोखिम और असलियत
निवेशकों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि ऐतिहासिक पैटर्न एक गाइड हो सकते हैं, लेकिन वे भविष्य के नतीजों की गारंटी नहीं देते। बाज़ार में अभी भी कई बड़े जोखिम हैं। सरकारी और घरेलू स्तर पर कर्ज़ का ऊंचा स्तर व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। इसके अलावा, कैपिटल अकाउंट सरप्लस (पूंजी खाते का अधिशेष) का कम होना बाज़ार को अचानक ग्लोबल कैपिटल आउटफ्लो (पूंजी के बहिर्वाह) के प्रति संवेदनशील बना सकता है।
इतिहास यह भी बताता है कि आर्थिक ख़बरों में सुधार आने से पहले ही बाज़ार अक्सर ठीक होने लगता है। 2001 के बाद से, ठहराव के ऐसे 11 समान अवधियों के विश्लेषण से पता चलता है कि वे आमतौर पर अगले एक से तीन वर्षों में सकारात्मक रिटर्न के साथ समाप्त हुईं। हालांकि, बाज़ार में उतार-चढ़ाव अप्रत्याशित है, और सबसे अच्छे ट्रेडिंग दिनों (जो अक्सर संकट के समय आते हैं) से चूकना, लॉन्ग-टर्म पोर्टफोलियो के प्रदर्शन को काफी प्रभावित कर सकता है।
आगे क्या देखें?
निवेशक कुछ मुख्य संकेतकों पर नज़र रख सकते हैं जो बाज़ार रीसेट की गति को प्रभावित करते हैं। इसमें कॉर्पोरेट कमाई की ग्रोथ का रुझान शामिल है, ताकि यह देखा जा सके कि क्या यह मौजूदा वैल्यूएशन को सही ठहराता है। ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स (ब्याज दरें) और घरेलू महंगाई के रुझानों पर नज़र रखना भी महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि ये कारक सीधे फॉरेन इंस्टीट्यूशनल (विदेशी संस्थागत) निवेश को प्रभावित करते हैं। लॉन्ग-टर्म निवेशक, अल्पकालिक बाज़ार के शोर की बजाय, कंपनियों की बैलेंस शीट की मज़बूती और ऊँचे कर्ज़ वाले माहौल में नेविगेट करने की उनकी क्षमता पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
