क्यों घटाई गईं कंपनियों की कमाई के अनुमान?
वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और तेल की कीमतों में उछाल का सीधा असर भारतीय कंपनियों की कमाई पर पड़ रहा है। इन चिंताओं के चलते, ब्रोकरेज फर्मों ने Nifty 50 कंपनियों के फाइनेंशियल ईयर 2027 (FY27) के लिए अनुमानों में 5% की और FY26 के अनुमानों में 7% की भारी कटौती की है।
कमाई के अनुमानों में भारी गिरावट
पिछले महीने, Nifty 50 की 40% कंपनियों के FY27 के अनुमानों में कटौती की गई, जो फरवरी में 32% थी। इस व्यापक कटौती के कारण FY27 के लिए कुल अनुमान 5% और FY26 के लिए 7% तक कम हो गए हैं। ऑटो, इंफ्रास्ट्रक्चर, फार्मा, इंश्योरेंस, सीमेंट और यूटिलिटीज जैसे सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। उदाहरण के लिए, IndiGo एयरलाइन चलाने वाली InterGlobe Aviation के FY27 ईपीएस (EPS) अनुमान में बढ़ते तेल की कीमतों के कारण लगभग 8% की कमी आई है।
वैल्यूएशन हुए आकर्षक, पर जोखिम बरकरार
हालांकि, बाजार में आई गिरावट के चलते Nifty 50 के वैल्यूएशन अब ज्यादा आकर्षक लग रहे हैं। Nifty 50 इंडेक्स फाइनेंशियल ईयर 2027 और 2028 के लिए लगभग 17-19 गुना फॉरवर्ड पी/ई (P/E) पर ट्रेड कर रहा है। यह अपने लॉन्ग-टर्म एवरेज पी/ई 18.9 के करीब और 7-साल के मीडियन 22.71 से नीचे है। एनालिस्ट्स के अनुसार, 16.5x से 18x का पी/ई रेश्यो इंडेक्स के लिए बेहतर माना जाता है। फिलहाल, इंडेक्स करीब 20.3 गुना पी/ई पर है, जो वर्तमान आर्थिक दबावों को देखते हुए ज्यादा सुधार की गुंजाइश नहीं छोड़ता।
भू-राजनीति का सीधा असर
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और सप्लाई चेन की दिक्कतें इस गिरावट की मुख्य वजह हैं। Brent क्रूड ऑयल की कीमत $110 प्रति बैरल के पार जाने से चिंताएं बढ़ गई हैं। भारत अपनी 85-90% क्रूड ऑयल की जरूरत आयात से ही पूरी करता है। ऐसे में, कच्चे तेल की कीमतों में हर $10 का उछाल भारत की जीडीपी ग्रोथ को 0.25-0.27% अंक तक कम कर सकता है और इंपोर्ट बिल को $1.5-2 बिलियन तक बढ़ा सकता है। एविएशन, पेंट्स, केमिकल्स, सीमेंट और लॉजिस्टिक्स जैसे तेल-आधारित या ऊर्जा पर निर्भर उद्योगों के प्रॉफिट मार्जिन पर भारी दबाव देखा जा रहा है। वहीं, डोमेस्टिक ऑयल प्रोड्यूसर्स को इसका फायदा मिल सकता है।
एनालिस्ट्स की मिली-जुली राय
कुछ एनालिस्ट्स, जैसे Mirae Asset Sharekhan, को उम्मीद है कि Nifty फाइनेंशियल ईयर 2027 तक 27,500 के स्तर तक पहुंच सकता है। लेकिन, कई अन्य सतर्क हैं। Bernstein ने मिडिल ईस्ट संघर्ष को देखते हुए साल के अंत तक Nifty का टारगेट 26,000 कर दिया है, जो पहले 28,100 था। Jefferies India का मानना है कि अगर जून के बाद भी सप्लाई चेन की समस्या बनी रही तो कमाई के अनुमानों में और बड़ी कटौती करनी पड़ सकती है। Nifty VIX (वोलेटिलिटी इंडेक्स) में भी तेज उछाल आया है, जो निवेशकों की बढ़ी हुई घबराहट को दर्शाता है। मार्च में फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) ने करीब $12 बिलियन का बिकवाली की है।
वैल्यूएशन एक जाल साबित हो सकता है?
फिलहाल Nifty का पी/ई रेश्यो अपने लॉन्ग-टर्म एवरेज के करीब है, लेकिन यह संभावित कमाई की और कटौती को पूरी तरह से नहीं दिखाता है। Jefferies के सबसे खराब परिदृश्य (worst-case scenario) के अनुसार, अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और सप्लाई चेन की समस्या जून के बाद भी जारी रहती है, तो Nifty 22,400 तक गिर सकता है, और FY28 की कमाई के अनुमानों में 8% की और कटौती हो सकती है। इसका मतलब है कि मौजूदा वैल्यूएशन, भू-राजनीतिक समस्याओं के बिगड़ने पर सुरक्षा प्रदान करने की स्थिति में नहीं हैं।
आउटलुक: अनिश्चितता बनी हुई है
बाजार को उम्मीद है कि मिडिल ईस्ट संघर्ष का असर अल्पावधि का होगा। हालांकि, यदि तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो इससे महंगाई बढ़ेगी, भारतीय रुपया कमजोर होगा और करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ेगा। यह लगातार दबाव कमाई के अनुमानों में और बड़ी कटौती का कारण बन सकता है, खासकर उन उद्योगों के लिए जो आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं।
सेक्टर जोखिम और निवेशक आउटफ्लो
एविएशन और सीमेंट जैसे सेक्टर, साथ ही आयातित कच्चे माल पर निर्भर उद्योग, बढ़ती कीमतों के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। हालांकि IT और बैंकिंग जैसे सेक्टरों को अधिक स्थिर माना जा रहा है, लेकिन बाजार में बिकवाली का दबाव बना हुआ है। FIIs द्वारा लगातार की जा रही बिकवाली और वैश्विक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (risk aversion) बाजार की गति को धीमा कर सकती है।
आगे की राह अनिश्चित, पर उम्मीदें भी
इन चुनौतियों के बावजूद, कुछ एनालिस्ट्स लंबी अवधि को लेकर आशावादी हैं। Motilal Oswal Financial Services का अनुमान है कि सरकारी नीतियों और निवेश चक्र में सुधार के चलते Nifty 50 कंपनियों की कमाई में फाइनेंशियल ईयर 2025-27 के बीच 11-12% की सालाना ग्रोथ रहेगी। लेकिन, अल्पावधि में बाजार की दिशा काफी हद तक मिडिल ईस्ट संघर्ष के बढ़ने और उसके वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर पड़ने वाले असर पर निर्भर करेगी। निवेशकों के लिए फिलहाल 'सेल-ऑन-राइज' (sell-on-rise) की रणनीति बेहतर हो सकती है, जब तक कि ये प्रमुख आर्थिक कारक स्पष्ट नहीं हो जाते।