Income Tax Act 2025: सेक्शन 58 लागू, छोटे कारोबारियों को झटका, अब नहीं मिलेगा लॉस सेट-ऑफ का फायदा

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Income Tax Act 2025: सेक्शन 58 लागू, छोटे कारोबारियों को झटका, अब नहीं मिलेगा लॉस सेट-ऑफ का फायदा

नए इनकम टैक्स एक्ट 2025 ने प्रिजम्पटिव टैक्सेशन (Presumptive Taxation) के नियमों को काफी सख्त कर दिया है। नए सेक्शन 58 के तहत, छोटे बिज़नेस और प्रोफेशनल्स को अब अपनी अनुमानित आय के खिलाफ किसी भी नुकसान (Loss) या कुछ खास भत्तों (Allowances) को क्लेम करने की सुविधा नहीं मिलेगी। इससे उन लोगों पर टैक्स का बोझ बढ़ सकता है जो इस सरल टैक्स रिपोर्टिंग तरीके को चुनते हैं।

सेक्शन 58 (4) का असर: टैक्सेबल इनकम पर क्या होगा?

नए लागू हुए इनकम टैक्स एक्ट 2025 में प्रिजम्पटिव टैक्सेशन (Presumptive Taxation) के प्रावधानों को एक ही जगह, यानी सेक्शन 58 में समेटा गया है। यह नया सेक्शन, 1961 के पुराने सेक्शंस 44AD, 44ADA और 44AE की जगह लेगा। हालांकि, टर्नओवर की सीमाएं और अनुमानित आय की दरें काफी हद तक पहले जैसी ही हैं, लेकिन फाइनल टैक्सेबल इनकम की गणना का तरीका अब ज्यादा प्रतिबंधात्मक हो गया है।

सबसे बड़ा बदलाव सेक्शन 58(4) के तहत आया है। इसके अनुसार, जो लोग प्रिजम्पटिव टैक्सेशन स्कीम चुनते हैं, वे इस स्कीम के तहत कैलकुलेट की गई आय के विरुद्ध किसी भी तरह की कटौती (Deductions), भत्ते (Allowances) या नुकसान की भरपाई (Loss Set-offs) नहीं कर पाएंगे। पहले टैक्सपेयर्स के पास अपनी टैक्स देनदारी को मैनेज करने के लिए ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी थी, जैसे कि वे अपनी अनुमानित आय को अन्य वित्तीय नुकसान, जैसे शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस या इंट्रा-हेड बिजनेस लॉस के साथ एडजस्ट कर सकते थे।

इसका मतलब यह है कि अगर किसी निवेशक या प्रोफेशनल को कहीं और असल वित्तीय नुकसान भी हुआ है, तो भी वे प्रिजम्पटिव रूट चुनने पर उस नुकसान का फायदा उठाकर टैक्स बेस को कम नहीं कर पाएंगे। नतीजतन, उन टैक्सपेयर्स के लिए टैक्सेबल इनकम असल में बढ़ जाएगी, जिन्होंने पहले अंतिम टैक्स भुगतान को कम करने के लिए लॉस सेट-ऑफ का इस्तेमाल किया था।

कटौतियों और अनुपालन में बदलाव

लॉस सेट-ऑफ की पाबंदियों के अलावा, नया एक्ट प्रिजम्पटिव आय के विरुद्ध चैप्टर VI-A के तहत मिलने वाली कटौतियों को भी खत्म कर देता है। इसमें टैक्स बचाने वाले कई निवेश शामिल हैं, जो पहले कुल टैक्स देनदारी को कम करने के लिए उपलब्ध थे।

इसके साथ ही, टैक्स ऑडिट के लिए सामान्य टर्नओवर-आधारित सीमाएं (जैसे हाई डिजिटल ट्रांजेक्शन वाले व्यवसायों के लिए ₹10 करोड़ की सीमा) तो वैसी ही हैं, लेकिन अनुपालन का माहौल टाइट हो गया है।

जो टैक्सपेयर्स निर्धारित प्रिजम्पटिव दरों से कम मुनाफा घोषित करने की कोशिश करेंगे, उन्हें टैक्स अधिकारियों से ज्यादा जांच का सामना करना पड़ सकता है। यह बदलाव एक ज्यादा कठोर टैक्स ढांचे की ओर इशारा करता है, जो पुराने एडजस्टमेंट और सेट-ऑफ सिस्टम की बजाय सीधे, भले ही थोड़ी ज्यादा, टैक्स वसूली को प्राथमिकता देता है।

निवेशकों और प्रोफेशनल्स को ध्यान देना चाहिए कि आने वाले समय में इस फाइनेंशियल ईयर की फाइनल टैक्स गणना पर नजर रखनी होगी। जो लोग अपनी व्यक्तिगत या व्यावसायिक टैक्स देनदारियों को मैनेज करने के लिए लॉस एडजस्टमेंट पर निर्भर करते हैं, उन्हें यह फिर से आंकना पड़ सकता है कि प्रिजम्पटिव स्कीम अभी भी रेगुलर टैक्स रिजीम की तुलना में सबसे प्रभावी विकल्प है या नहीं, जहां आय और खर्चों की प्रकृति के आधार पर ऐसी कटौतियां अभी भी अनुमत हो सकती हैं।

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