IPO को मंज़ूरी, पर प्रॉफिट में बड़ी गिरावट!
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के निवेशकों के लिए एक बड़ी खबर है। बोर्ड ने लंबे इंतजार के बाद इसके इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) को मंजूरी दे दी है। खास बात यह है कि यह IPO ऑफर-फॉर-सेल (OFS) रूट से होगा, जिसका सीधा मतलब है कि मौजूदा शेयरहोल्डर्स को अपनी हिस्सेदारी बेचने का मौका मिलेगा और कंपनी के पास कोई नई पूंजी नहीं आएगी। यह सब तब हुआ है जब एक्सचेंज का फाइनेंशियल परफॉरमेंस (Financial Performance) इस तिमाही में काफी कमजोर रहा। दिसंबर 2025 को खत्म हुई तिमाही में NSE का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट साल-दर-साल 37% लुढ़ककर ₹2,408 करोड़ पर आ गया। वहीं, रेवेन्यू (Revenue) भी 10% की गिरावट के साथ ₹4,349 करोड़ दर्ज किया गया।
क्यों सिर्फ OFS, क्यों नहीं फंड जुटाया?
NSE के बोर्ड ने IPO को OFS के ज़रिए आगे बढ़ाने का फैसला किया है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह उन शेयरहोल्डर्स को लिक्विडिटी (Liquidity) देना चाहता है जो 10 साल से ज़्यादा समय से कंपनी में निवेश किए हुए हैं। चूंकि कंपनी सीधे तौर पर कोई नया फंड (Capital) नहीं जुटा रही है, इसलिए इस IPO से कंपनी को सीधे तौर पर फायदा नहीं होगा। कंपनी के मैनेजमेंट ने लागत में कटौती (Cost Cutting) पर जोर दिया है, लेकिन प्रॉफिट में आई यह गिरावट चिंताजनक है। इसके बावजूद, अनलिस्टेड मार्केट (Unlisted Market) में NSE का वैल्यूएशन (Valuation) अभी भी मजबूत है, जो ₹5 लाख करोड़ से ज़्यादा का आंका जा रहा है। इसका इम्प्लाइड P/E मल्टीपल (Implied P/E Multiple) करीब 55x है। यह दिखाता है कि मार्केट भविष्य की ग्रोथ को भुनाने की उम्मीद कर रहा है, भले ही मौजूदा आय (Earnings) दबाव में हो।
IPO का दशक लंबा सफर और नई पहल
NSE का पब्लिक लिस्टिंग (Public Listing) का सफर 2016 से चल रहा है। कई बार रेगुलेटरी स्क्रूटिनी (Regulatory Scrutiny) और गवर्नेंस इश्यूज (Governance Issues) के कारण इसे टालना पड़ा। खासकर को-लोकेशन फैसिलिटीज़ (Co-location Facilities) और ट्रेडिंग सिस्टम्स तक प्रेफरेंशियल एक्सेस (Preferential Access) जैसे मुद्दों ने इसे अटकाए रखा। इन सब के बाद, एक्सचेंज ने कंप्लायंस (Compliance) और बोर्ड ओवरसाइट (Board Oversight) को मजबूत किया है। इसी के साथ, NSE ने एक और बड़ा कदम उठाया है। बोर्ड ने 60% हिस्सेदारी के साथ एक नई सब्सिडियरी (Subsidiary) को कोल एक्सचेंज (Coal Exchange) लॉन्च करने की मंजूरी दी है, जिसका मकसद कोयले के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग (Electronic Trading) और फिजिकल डिलीवरी (Physical Delivery) को आसान बनाना है।
बाज़ार में सबसे आगे, पर BSE से तुलना
NSE भारत का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज है। खासकर इक्विटी डेरिवेटिव्स (Equity Derivatives) सेगमेंट में इसका दबदबा है, जो इसके रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा है। इसके डोमेस्टिक राइवल (Domestic Rival) बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) की तुलना में, NSE का ट्रेडिंग वॉल्यूम (Trading Volumes) और मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) लगातार ज़्यादा रहा है। फाइनेंशियल डेटा के अनुसार, NSE का रेवेन्यू BSE से करीब 10 गुना ज़्यादा है और इसका EPS (Earnings Per Share) भी काफी बेहतर है। एनालिस्ट्स (Analysts) NSE का फॉरवर्ड P/E (Forward P/E) करीब 45.8x मान रहे हैं, जो BSE के 70.1x से काफी कम है। हालांकि, NSE का डिविडेंड पेआउट रेशियो (Dividend Payout Ratio) 71% है, जो BSE के 24% से काफी ज़्यादा है। भारतीय शेयर बाज़ार (Indian Stock Market) में आजकल 'नैरेटिव्स' (Narratives) स्टॉक की चाल को काफी प्रभावित कर रहे हैं, जो फंडामेंटल परफॉरमेंस (Fundamental Performance) पर भारी पड़ सकते हैं। 6 फरवरी, 2026 को बेंचमार्क BSE SENSEX 83,580 अंक पर था, जिसमें दिन में मामूली बढ़त थी लेकिन महीने में गिरावट देखी गई।
आगे की राह और निवेशकों के लिए क्या?
IPO कमिटी का गठन, जिसकी अध्यक्षता टेबलेश पांडे (Tablesh Pandey) कर रहे हैं, यह बताता है कि लिस्टिंग की प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है। NSE का पब्लिक डेब्यू (Public Debut) भारत के सबसे बड़े IPOs में से एक होने की उम्मीद है। OFS स्ट्रक्चर (OFS Structure) मौजूदा निवेशकों के लिए तो फायदेमंद है, लेकिन अनलिस्टेड मार्केट में इसका वैल्यूएशन (Valuation) यह दिखाता है कि निवेशकों की NSE के शेयरों में काफी दिलचस्पी है। IPO का समय और फाइनल वैल्यूएशन (Final Valuation) बाज़ार की मौजूदा स्थिति और रेगुलेटरी अप्रूवल (Regulatory Approvals) पर निर्भर करेगा। SEBI से मंजूरी मिलने के बाद, एक दशक के इंतजार को खत्म करने में एक बड़ी बाधा पार हो गई है। इस IPO की सफलता पर बाज़ार की बारीकी से नज़र रहेगी, जो भारतीय कैपिटल मार्केट्स (Capital Markets) के लिए एक बैरोमीटर का काम करेगा।