रिटेल निवेशकों की रफ़्तार
भारत में वित्तीय बाज़ार अब आम आदमी की पहुँच में आ गया है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर निवेशकों के कुल यूनिक अकाउंट्स की संख्या 26 करोड़ का आंकड़ा पार कर गई है। यह रफ़्तार इतनी तेज़ है कि पिछले चार महीनों में ही 1 करोड़ नए निवेशक बाज़ार से जुड़ गए हैं, जो कि एक अभूतपूर्व रिकॉर्ड है। एक्सचेंज इसे डिजिटलीकरण और आसान KYC प्रक्रिया का नतीजा बता रहा है। लेकिन बाज़ार के जानकारों का मानना है कि इतनी तेज़ी अक्सर बाज़ार में टॉप (late-cycle euphoria) का संकेत देती है। खासकर, छोटे शहरों और गैर-पारंपरिक इलाकों से आ रहे नए निवेशक, जो पहले पारंपरिक वेल्थ मैनेजमेंट पर भरोसा करते थे, अब सट्टेबाज़ी की ओर ज़्यादा आकर्षित हो रहे हैं। यह प्रवृत्ति अक्सर स्मॉल और मिड-कैप शेयरों में बड़ी उथल-पुथल का कारण बनती है।
डिजिटल इंडिया और लिक्विडिटी का भ्रम
आजकल स्मार्टफोन बाज़ार में ट्रेडिंग का मुख्य ज़रिया बन गया है। कैश मार्केट में 20% से ज़्यादा का कारोबार मोबाइल प्लेटफॉर्म्स से हो रहा है। इससे शेयर बाज़ार में एंट्री करना आसान तो हुआ है, लेकिन निवेशक अब ज़्यादा रिएक्टिव (reactive) हो गए हैं। जहाँ इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर (institutional investor) लंबी अवधि के लक्ष्यों और वैल्यूएशन मॉडल से बंधे होते हैं, वहीं ये मोबाइल-फर्स्ट रिटेल निवेशक सोशल मीडिया के सेंटीमेंट (social sentiment) और छोटी अवधि के प्राइस मूमेंट (price momentum) से बहुत जल्दी प्रभावित होते हैं। पिछले पाँच सालों में निफ्टी 50 (Nifty 50) ने सालाना 7.1% का रिटर्न दिया है। ऐसे में यह चिंता की बात है कि कई नए निवेशक बाज़ार के टॉप वैल्यूएशन पर एंट्री ले रहे हैं और शायद वैसी रिटर्न की उम्मीद कर रहे हैं जो अगले साइकल में मिलना मुश्किल हो।
संरचनात्मक कमज़ोरी और व्यवहार संबंधी जोखिम
इस रिकॉर्ड तोड़ वृद्धि के पीछे सबसे बड़ी चिंता यह है कि ये नए निवेशक कितने क्वालिटी वाले हैं। जहाँ एक ओर सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) में पिछले दशक में आठ गुना वृद्धि हुई है, जो एक अनुशासित निवेश का संकेत है, वहीं दूसरी ओर अचानक से खुले ये नए अकाउंट्स 'डे-ट्रेडिंग' (day-trading) जैसी सट्टेबाज़ी वाली एक्टिविटीज़ में बड़ी बढ़ोतरी का इशारा करते हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी बाज़ार में बड़ी तेज़ी के बाद करेक्शन आता है या वोलैटिलिटी बढ़ती है, तो ये रिटेल निवेशक बड़ी संख्या में बाज़ार से बाहर हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर जैसे राज्यों से बड़ी संख्या में नए निवेशकों का जुड़ना यह भी दर्शाता है कि बाज़ार अब उन तबकों तक पहुँच रहा है जहाँ वित्तीय साक्षरता (financial literacy) का स्तर कम है। ऐसे में, अगर SEBI को यह पता चलता है कि इन नए निवेशकों ने मार्जिन पर ट्रेडिंग (margin-based trading) का ज़्यादा इस्तेमाल किया है, तो बाज़ार में अचानक गिरावट आने पर लिक्विडिटी (liquidity) का संकट खड़ा हो सकता है।
