NITI Aayog ने भारत की बढ़ती क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) की जरूरत को पूरा करने के लिए एक हाई-लेवल मीटिंग बुलाई है। 2070 तक इन ज़रूरी खनिजों की डिमांड में **51%** तक की बढ़ोतरी का अनुमान है। भारत का लक्ष्य इंपोर्ट पर निर्भरता कम करके, घरेलू स्तर पर माइनिंग, प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना है। यह इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और क्लीन एनर्जी सेक्टर के लिए सप्लाई चेन को मजबूत बनाने की दिशा में एक अहम पहल है।
NITI Aayog ने हाल ही में विशेषज्ञों और इंडस्ट्री के प्रमुख लोगों के साथ एक अहम मीटिंग की है। इसका मकसद क्रिटिकल मिनरल्स की भारत की लंबी अवधि की सप्लाई को सुरक्षित करना है। ये मिनरल्स आज की मॉडर्न टेक्नोलॉजी, जैसे इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरीज, सोलर पैनल और हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग के लिए बेहद ज़रूरी हैं। भारत 2070 तक नेट-जीरो एमिशन (Net-Zero Emissions) का लक्ष्य हासिल करने की ओर बढ़ रहा है, और इस अनुमान के मुताबिक, इन खास मिनरल्स की डिमांड 51% बढ़कर 169 मिलियन टन तक पहुँच सकती है।
घरेलू क्षमता की सामरिक ज़रूरत
फिलहाल, भारत कई ज़रूरी मिनरल्स के लिए इंपोर्ट पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। इससे सप्लाई चेन में कमज़ोरियां आ सकती हैं, जो इंडस्ट्रियल ग्रोथ को प्रभावित कर सकती हैं। इस मीटिंग में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि इन संसाधनों को सुरक्षित करना सिर्फ एनर्जी ट्रांज़िशन (Energy Transition) का मामला नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए भी ज़रूरी है। घरेलू एक्सप्लोरेशन (Exploration) और माइनिंग पर फोकस करके, भारत एक मज़बूत वैल्यू चेन (Value Chain) बनाना चाहता है, जो ग्लोबल मार्केट के उतार-चढ़ाव और ट्रेड रिस्ट्रिक्शन (Trade Restrictions) पर कम निर्भर हो।
प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग का विस्तार
सिर्फ माइनिंग से आगे बढ़कर, मीटिंग में लोकल प्रोसेसिंग (Processing) और रिफाइनिंग (Refining) क्षमताएं विकसित करने के महत्व पर भी ज़ोर दिया गया। कच्चे मिनरल्स को बैटरी-ग्रेड मटेरियल में बदलना एक जटिल प्रक्रिया है, जिसकी ग्लोबल कैपेसिटी (Capacity) फिलहाल कुछ ही देशों में केंद्रित है। इसके अलावा, सरकार रीसाइक्लिंग को भी एक स्थायी तरीका मान रही है, जिससे पुरानी बैटरीज और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से कीमती मेटल्स को रिकवर किया जा सके। इन टेक्नोलॉजीज को लोकल लेवल पर विकसित करने से आने वाले दशकों में लागत और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सकता है।
इंडस्ट्री और निवेशकों के लिए मायने
भारतीय इंडस्ट्रीज, खासकर ऑटोमोटिव, इलेक्ट्रॉनिक्स और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर के लिए, घरेलू मिनरल सिक्योरिटी की ओर यह पॉलिसी शिफ्ट भविष्य में रॉ मटेरियल की स्थिर लागत की ओर ले जा सकता है। मिनरल एक्सप्लोरेशन, रिफाइनिंग और बैटरी टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियां भविष्य में सरकारी इंसेंटिव (Incentives) या तेज़ी से रेगुलेटरी क्लीयरेंस (Regulatory Clearances) से फायदा उठा सकती हैं, क्योंकि सरकार इस सेक्टर को प्राथमिकता दे रही है। हालांकि, निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि एक घरेलू माइनिंग और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री बनाने में भारी कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) शामिल है और इसमें प्रोजेक्ट्स के लंबे समय और मिनरल एक्सट्रैक्शन (Mineral Extraction) की तकनीकी जटिलता जैसे जोखिम भी हैं।
निवेशकों के लिए अगला कदम माइनिंग ऑक्शन (Mining Auction) की टाइमलाइन और मिनरल प्रोसेसिंग व रीसाइक्लिंग यूनिट्स के लिए दिए जाने वाले किसी भी खास फिस्कल सपोर्ट (Fiscal Support) से जुड़ी पॉलिसी अनाउंसमेंट्स (Policy Announcements) पर नज़र रखना होगा। भारत की क्लीन एनर्जी सप्लाई चेन के भविष्य के कॉम्पिटिटिव लैंडस्केप (Competitive Landscape) को समझने के लिए इस सेक्टर में सरकारी पहलों पर लगातार नज़र रखना ज़रूरी होगा।
