NFHS-6 सर्वे के नए आंकड़े बताते हैं कि भारत की राष्ट्रीय प्रजनन दर (Fertility Rate) भले ही 2 पर स्थिर हो, लेकिन राज्य-स्तर पर देखे तो प्रजनन स्वास्थ्य और परिवार नियोजन में बड़ी खाई नजर आती है। ये नतीजे इशारा करते हैं कि भविष्य की स्वास्थ्य नीतियां एक समान राष्ट्रीय लक्ष्यों से हटकर, अलग-अलग क्षेत्रों और आबादी की जरूरतों के हिसाब से बनाई जानी चाहिए।
Detailed Coverage
देश में स्वास्थ्य का 'बड़ा गैप'
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) के छठे दौर के नतीजों ने 29 मई को देश के सामने एक बड़ा सच पेश किया है। सर्वे से पता चलता है कि पूरे देश के लिए एक ही स्वास्थ्य नीति अब शायद कारगर न हो। राष्ट्रीय स्तर पर कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate - TFR) 2 है, जो जनसंख्या के रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से कम है। लेकिन यह आंकड़ा राज्यों और ग्रामीण-शहरी इलाकों के बीच की बड़ी असमानताओं को छिपा रहा है।
राज्यों में बढ़ती खाई
सर्वे में देश के अलग-अलग हिस्सों के बीच एक बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है। जहां ग्रामीण भारत की TFR 2.1 है, वहीं शहरी इलाकों में यह 1.6 है। राज्य-स्तर पर देखें तो बिहार की TFR अभी भी 2.7 के साथ सबसे ऊपर है। वहीं, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों में प्रजनन दर कई सालों से रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे बनी हुई है। इस अंतर के कारण नीति निर्माताओं के सामने दो अलग-अलग तरह की चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। ज्यादा प्रजनन दर वाले इलाकों में रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विसेज और फैमिली प्लानिंग की सुविधाओं में ज्यादा निवेश की जरूरत है। दूसरी ओर, कम प्रजनन दर और बढ़ती उम्र वाली आबादी वाले राज्यों को बुजुर्गों की देखभाल, उनके लिए स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर और चाइल्डकेयर सपोर्ट पर ध्यान देना होगा।
परिवार नियोजन और लैंगिक असंतुलन
देश भर में फैमिली प्लानिंग की अधूरी जरूरत (unmet need) में मामूली कमी आई है, जो पिछले सर्वे के 9.4% से घटकर 8.5% हो गई है। हालांकि, यह राष्ट्रीय सुधार कुछ राज्यों की जमीनी हकीकत को नहीं दर्शाता। मेघालय में यह जरूरत 21% तक है, जबकि बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में भी यह राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। इन इलाकों में लाखों महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक (contraception) तक पहुंचना अभी भी एक बड़ी बाधा है। सर्वे लैंगिक असंतुलन की ओर भी इशारा करता है: आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में महिला नसबंदी (female sterilization) कुल तरीकों का लगभग 70% है, जबकि पुरुष भागीदारी सिर्फ 0.5% है।
किशोर स्वास्थ्य और दीर्घकालिक नीतिगत जरूरतें
बाल विवाह (child marriage) को कम करने में प्रगति तो दिख रही है, पर यह अभी भी असमान है। राष्ट्रीय स्तर पर, 20 से 24 साल की 20.1% महिलाओं ने 18 साल की उम्र से पहले शादी करने की बात कही है। पश्चिम बंगाल, बिहार और त्रिपुरा जैसे राज्यों में यह दर बहुत ज्यादा है, जहां एक तिहाई से ज्यादा युवा महिलाओं की शादी वयस्क होने से पहले हो जाती है। इसके अलावा, किशोर गर्भावस्था (adolescent motherhood) की दर राष्ट्रीय स्तर पर 6.7% पर स्थिर बनी हुई है, जो कि इन्हीं राज्यों में ज्यादा केंद्रित है।
ये नतीजे बताते हैं कि स्वास्थ्य खर्च और नीतिगत योजनाएं अब ज्यादा लक्षित, जीवनचक्र-आधारित (lifecycle-based) दृष्टिकोण की ओर बढ़ेंगी। निवेशकों और मार्केट एनालिस्ट्स के लिए, इसका मतलब है कि उन प्राइवेट हेल्थकेयर सर्विसेज, जेरियाट्रिक केयर प्रोवाइडर्स और खास डायग्नोस्टिक या रिप्रोडक्टिव हेल्थ कंपनियों की मांग बढ़ सकती है, जो उन राज्यों में प्रभावी ढंग से काम कर सकें जहां ज्यादा हस्तक्षेप की जरूरत है। अब देखना यह है कि राज्य सरकारें और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इन भौगोलिक-विशिष्ट स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने बजट आवंटन और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल को कैसे समायोजित करते हैं।
