भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की वजह से पारंपरिक नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है, जबकि ग्रेजुएट्स की एम्प्लॉयबिलिटी (Employability) अभी भी करीब **45%** पर अटकी हुई है। NEP 2020 (National Education Policy) में सुधारों की रूपरेखा तो है, लेकिन अब ध्यान AI लिटरेसी और वोकेशनल ट्रेनिंग की ओर बढ़ रहा है।
AI का बढ़ता साया और शिक्षा नीति का इम्तिहान
जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का प्रभाव कार्यक्षेत्र (Job Market) में बढ़ रहा है, भारत की शिक्षा प्रणाली को भी खुद को बदलने की ज़रूरत महसूस हो रही है। पारंपरिक रटने-रटाने वाले मॉडल अब उतने कारगर नहीं रहे। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 ने वैसे तो पढ़ाई के स्ट्रीम्स को लचीला बनाने के लिए 5+3+3+4 जैसा ढांचा पेश किया था, लेकिन टेक्नोलॉजी की तेज रफ्तार को देखते हुए अब यह सोचना पड़ रहा है कि भारतीय वर्कफोर्स (Workforce) का मूल्य कैसे बनाए रखा जाए।
ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, भारत हर साल लगभग 50 लाख ग्रेजुएट्स तैयार करता है, लेकिन इंडस्ट्री में उनकी एम्प्लॉयबिलिटी (रोजगार क्षमता) अक्सर 40% से 45% के बीच ही रहती है। इसका मतलब है कि एक बड़ी आबादी को या तो कम महत्व वाली नौकरियां मिलती हैं या फिर उन्हें कंपनियों में दोबारा ट्रेनिंग लेनी पड़ती है।
इंजीनियरिंग मॉडल से आगे की सोच
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अपनी युवा आबादी के इस बड़े फायदे को प्रोडक्टिविटी (Productivity) में बदला जाए। AI के आने से रूटीन कोडिंग और एनालिसिस जैसे काम ऑटोमेट (Automate) हो रहे हैं, ऐसे में सिर्फ इंजीनियरिंग डिग्री बांटने का पुराना तरीका अब सवालों के घेरे में है। इसी को देखते हुए, अब शिक्षा को स्थानीय आर्थिक ज़रूरतों से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
छोटे शहरों में मौजूद इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट्स (ITIs) को खास ट्रेनिंग के हब के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना है। इसमें AI को एग्रीकल्चरल क्लाइमेट मॉडलिंग या टेक्सटाइल डिजाइन जैसे क्षेत्रों में एकीकृत करना शामिल है। इसका मकसद माइक्रो-एंट्रप्रेन्योरशिप (Micro-entrepreneurship) को बढ़ावा देना है, ताकि लोग जेनेरिक स्किल्स (Generic Skills) पर निर्भर न रहें, जो ऑटोमेशन का शिकार आसानी से हो सकते हैं।
बजट 2026-27 और आगे का रास्ता
2026-27 के यूनियन बजट (Union Budget) में AI-इनेबल्ड (AI-enabled) करिकुलम और यूनिवर्सिटी टाउनशिप (University Townships) के विकास के लिए संकेत दिए गए हैं, जो इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकारी फोकस को दिखाता है। हालांकि, निवेशकों और आर्थिक जानकारों के लिए सबसे बड़ा रिस्क (Risk) इसके अमल पर टिका है।
नीतियों के इरादे और क्लासरूम की असलियत के बीच ऐतिहासिक रूप से एक गैप रहा है। इसलिए, इन पहलों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संस्थान कितनी जल्दी अपने सिलेबस में प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग (Prompt Engineering), क्रिटिकल जजमेंट (Critical Judgement) और इंटरडिसिप्लिनरी स्टडीज (Interdisciplinary Studies) जैसे नए विषय जोड़ पाते हैं।
आगे क्या देखना होगा?
निवेशकों और मार्केट एनालिस्ट्स (Market Analysts) के लिए, वोकेशनल ट्रेनिंग (Vocational Training) को बढ़ावा देना और AI-रेडी ग्रेजुएट्स तैयार करना मुख्य फोकस रहेगा। बजट में घोषित की गई यूनिवर्सिटी टाउनशिप्स का वास्तविक निर्माण और निजी व सरकारी संस्थान कितनी तेजी से ऐसे फ्लेक्सिबल क्रेडिट सिस्टम (Flexible Credit Systems) अपनाते हैं, जिससे छात्र वोकेशनल ट्रेनिंग के बाद पढ़ाई में वापस आ सकें, ये देखना अहम होगा।
आखिरकार, यह मापा जाएगा कि शिक्षा क्षेत्र कॉर्पोरेट री-ट्रेनिंग (Corporate Retraining) की लागत को कितना कम कर पाता है और 'पहले ही दिन से' एम्प्लॉयबल ग्रेजुएट्स का प्रतिशत कितना बढ़ा पाता है। अगर यह गैप नहीं भरा गया, तो यह आशंका बनी हुई है कि स्किल्स और इंडस्ट्री की मांग के बीच लगातार मिसमैच (Mismatch) के कारण देश का डेमोग्राफिक डिविडेंड (Demographic Dividend) एक आर्थिक बोझ बन सकता है।
