Moody's का अनुमान है कि 2026 में भी भारत दुनिया की सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा। हालाँकि ग्लोबल स्लोडाउन के चलते ग्रोथ में थोड़ी कमी आ सकती है, फिर भी भारत चीन, अमेरिका और यूरोज़ोन को पीछे छोड़ देगा। निवेशकों को AI से होने वाली ग्रोथ पर नज़र रखनी चाहिए, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बड़े जोखिम बने हुए हैं।
2026 में भी भारत की आर्थिक रफ्तार सबसे तेज
Moody's Analytics की लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार, भारत 2026 में भी दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बने रहने का अनुमान है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के धीमे पड़ने के बावजूद, भारत की ग्रोथ चीन, अमेरिका, जापान और यूरोज़ोन जैसे देशों से आगे रहेगी।
ग्लोबल ग्रोथ और देशों की तुलना
2026 के लिए ग्लोबल जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 2.5% है, जो कि संभावित ग्रोथ रेट 3% से कम है। इस बीच, चीन की ग्रोथ इस साल 4.6% से घटकर 2027 में 4.2% रह सकती है। वहीं, अमेरिका की इकोनॉमी अगले दो साल 2% की औसत ग्रोथ दर्ज कर सकती है। यूरोज़ोन के लिए 2026 में 0.8% और 2027 में 1.6% ग्रोथ का अनुमान है। जापान की इकोनॉमी की हालत और भी खस्ता है, जहाँ ग्रोथ 0.5% सालाना से नीचे रहने की उम्मीद है।
AI का असर और सेक्टर की मजबूती
वैश्विक उत्पादन को सहारा देने वाला एक अहम फैक्टर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बढ़ता प्रभाव है। Moody's के अनुसार, AI, डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड कंप्यूटिंग से जुड़े देश और इंडस्ट्रीज बाकी इकोनॉमी के दबाव के बावजूद मजबूती दिखा रहे हैं। इस टेक्नोलॉजी-आधारित इन्वेस्टमेंट साइकिल ने एशिया में मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट को सहारा दिया है। भारतीय निवेशकों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कैसे टेक्नोलॉजी-केंद्रित सेक्टर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट, पारंपरिक इंडस्ट्रीज की तुलना में जीडीपी की स्थिरता में योगदान करते हैं।
भू-राजनीतिक जोखिम और आर्थिक स्थिरता
हालांकि, यह ग्रोथ का अनुमान बड़े जोखिमों से अछूता नहीं है। Moody's के अनुसार, भू-राजनीतिक अस्थिरता ग्लोबल आउटलुक के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मध्य पूर्व में संभावित संघर्ष या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों में किसी भी बाधा से तेल की कीमतों में तुरंत वृद्धि हो सकती है। चूँकि भारत कच्चे तेल का एक बड़ा इम्पोर्टर है, एनर्जी की कीमतों में अचानक उछाल से महंगाई बढ़ सकती है और घरेलू प्रॉफिट मार्जिन व कंज्यूमर खर्च की क्षमता पर दबाव पड़ सकता है। निवेशकों को इन बाहरी घटनाओं पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि ये करेंसी की स्थिरता और कंपनियों की लागत को सीधे प्रभावित करते हैं।
