फिस्कल कंसॉलिडेशन क्यों है कम?
एजेंसी ने इस बात पर जोर दिया है कि बजट डेफिसिट (Budget Deficit) को इस फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में GDP के 4.4% से घटाकर 4.3% करने का लक्ष्य, फिस्कल डिसिप्लिन (Fiscal Discipline) की ओर एक कदम तो है, लेकिन यह भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग (Sovereign Credit Rating) को बदलने के लिए पर्याप्त नहीं है।
Moody's Ratings के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट Christian de Guzman ने बताया कि घाटा पूर्व-महामारी स्तरों की तुलना में अभी भी बड़ा है, जो दर्शाता है कि कंसॉलिडेशन के प्रयासों के बावजूद फिस्कल प्रेशर (Fiscal Pressure) बना हुआ है।
रेटिंग बदलने के लिए मेट्रिक्स काफी नहीं
De Guzman ने स्पष्ट किया कि कुल मिलाकर फिस्कल मेट्रिक्स (Fiscal Metrics) में सुधार इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा है कि भारत की लॉन्ग-टर्म लोकल और फॉरेन-करेंसी सॉवरेन रेटिंग्स (Long-term Local and Foreign-currency Sovereign Ratings) में कोई बदलाव किया जा सके। Moody's ने पिछले साल भारत की रेटिंग्स को स्टेबल आउटलुक (Stable Outlook) के साथ कन्फर्म (Affirm) किया था, जिसका मुख्य कारण इकॉनमी की मजबूती और डोमेस्टिक फंडिंग (Domestic Funding) थी।
मौजूदा फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में इकॉनमी के 7.4% की दर से बढ़ने और इन्फ्लेशन (Inflation) के करीब 2% रहने का अनुमान है। Moody's इन आंकड़ों को स्वीकार करता है, लेकिन उनका मानना है कि रेटिंग अपग्रेड के लिए ये फिस्कल कंसर्न्स (Fiscal Concerns) को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। यह असेसमेंट (Assessment) बताता है कि भले ही सरकार सही दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन भारत की क्रेडिटवर्थीनेस (Creditworthiness) में स्थायी सुधार लाने के लिए फिस्कल रिफॉर्म (Fiscal Reform) की गति और पैमाने को और तेज करने की जरूरत है।