देश में मॉनसून की बारिश की कमी घटकर **19.3%** रह गई है, जो जून के मुकाबले राहत की खबर है। हालांकि, खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल की तुलना में अभी भी पिछड़ रही है, जिससे खाद्य महंगाई और कृषि उत्पादन को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
मॉनूसन की चाल
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अहम मॉनूसन ने जुलाई की शुरुआत में कुछ सुधार के संकेत दिखाए हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 13 जुलाई तक कुल वर्षा की कमी घटकर 19.3% रह गई, जो जून के अंत में 38% थी। यह कुछ राहत जरूर देता है, लेकिन बारिश का वितरण अभी भी असमान है, खासकर पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में 35.5% की कमी बनी हुई है।
खरीफ बुवाई पर असर
कृषि क्षेत्र के लिए जुलाई का महीना बहुत अहम होता है, क्योंकि इसी में खरीफ की आधी से ज़्यादा बुवाई पूरी होती है। 10 जुलाई तक, कुल बुवाई 53.12 मिलियन हेक्टेयर में हुई है, जो 2025 की समान अवधि में 63.25 मिलियन हेक्टेयर थी। दालों, तिलहन और मोटे अनाजों जैसी ज़रूरी फसलों की बुवाई में यह देरी मॉनूसन के देर से आने की ओर इशारा करती है, जिसने कई अहम राज्यों में बुवाई के कामों को धीमा कर दिया है।
महंगाई और आर्थिक चुनौतियाँ
खुदरा महंगाई जून में बढ़कर 4.38% हो गई, जो भारतीय रिजर्व बैंक के 4% के लक्ष्य से ऊपर है। जून में खाद्य महंगाई 5.32% थी। विश्लेषकों का मानना है कि मॉनूसन के अनिश्चित पैटर्न और अल नीनो के संभावित प्रभाव के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतें अस्थिर रह सकती हैं। इससे केंद्रीय बैंक के लिए महंगाई को काबू में रखना और मुश्किल हो जाएगा, जिसके लिए FY27 में खुदरा महंगाई 5.1% रहने का अनुमान है।
फर्टिलाइजर सब्सिडी और विकास दर
कृषि क्षेत्र बाहरी दबावों का भी सामना कर रहा है, जिसका असर सरकारी खजाने पर पड़ सकता है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के कारण फर्टिलाइजर जैसे कृषि इनपुट्स की लागत में अस्थिरता आई है। यूरिया और डी-अमोनियम फॉस्फेट जैसे उत्पादों के बड़े आयातक के तौर पर, भारत पर राष्ट्रीय बजट का दबाव बढ़ सकता है। FY27 के लिए सरकार का फर्टिलाइजर सब्सिडी का आवंटन ₹1.77 ट्रिलियन है, लेकिन अगर कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची रहती हैं तो यह आंकड़ा कम पड़ सकता है। वहीं, GDP ग्रोथ के अनुमानों को भी संशोधित किया गया है, जिसमें 2026-27 के पूरे साल के लिए 6.6% की उम्मीद जताई जा रही है, जो आर्थिक अनिश्चितता को दर्शाता है।
निवेशकों के लिए, आने वाले हफ्तों में बारिश के वितरण और खरीफ बुवाई के अंतिम आंकड़ों पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा। कृषि गतिविधियों की रफ्तार खाद्य महंगाई के रुझान और ग्रामीण सहायता कार्यक्रमों पर सरकारी खर्च को तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।
