युद्ध के डर से मार्केट्स में मची खलबली
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर दुनिया भर के शेयर बाजारों पर साफ दिखाई दिया। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ी तनातनी के कारण क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतों में आग लग गई। ब्रेंट क्रूड 13% तक उछलकर $80 प्रति बैरल के ऊपर चला गया, वहीं WTI क्रूड में भी वैसी ही तेजी देखी गई। इस सप्लाई चिंता ने ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स में डर का माहौल बना दिया, जिसे 'रिस्क-ऑफ' सेंटिमेंट कहा जाता है।
भारत पर कितना असर?
इस वैश्विक गिरावट का भारतीय बाजारों पर भी गहरा असर पड़ा। बेंचमार्क सेंसेक्स (Sensex) 1,048 अंक और निफ्टी 50 (Nifty 50) 313 अंक गिरकर खुले। तीन दिनों के दौरान, निवेशकों की कुल संपत्ति में करीब ₹10 लाख करोड़ की भारी कमी आई, और 869 से ज्यादा स्टॉक्स अपने 52-हफ्ते के निचले स्तर (52-week lows) पर पहुंच गए। वहीं, डिफेंस स्टॉक्स (Defense Stocks) में तेजी देखी गई, जबकि ट्रैवल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर (Travel & Hospitality Sector) पर भारी दबाव आया, इंटरग्लोब एविएशन (InterGlobe Aviation) जैसे शेयर 7% से ज्यादा गिरे।
AI का युद्ध में इस्तेमाल और बाकी ख़बरें
इस बीच, एक ऐसी रिपोर्ट भी सामने आई जिसने आधुनिक युद्ध के तरीके को लेकर नई बहस छेड़ दी है। खबर है कि अमेरिकी सेना ने हाल ही में ईरान पर हुए हमलों के दौरान खुफिया जानकारी जुटाने और टारगेट तय करने के लिए AI (Artificial Intelligence) प्लेटफॉर्म Claude का इस्तेमाल किया। यह तब हुआ जब राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद इस AI तकनीक के इस्तेमाल पर रोक लगाने के आदेश दिए थे। इस घटना ने टेक्नोलॉजी सेक्टर के वैल्यूएशन (Valuation) और राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों पर भविष्य के असर को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
डीप डाइव: वैश्विक सप्लाई चेन और भारत की पोजीशन
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से शिपिंग (Shipping) में संभावित रुकावट, जो दुनिया के करीब 20% तेल सप्लाई का रास्ता है, एनर्जी मार्केट्स के लिए एक बड़ा खतरा है। एनालिस्ट्स (Analysts) का मानना है कि अगर यह रुकावट लंबी चली तो तेल की कीमतें $100-$130 प्रति बैरल तक जा सकती हैं, जिसका सीधा असर ग्लोबल इन्फ्लेशन (Inflation) और इकोनॉमिक ग्रोथ (Economic Growth) पर पड़ेगा। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए, यह चिंता का विषय है क्योंकि इससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है, रुपया (Rupee) 91 प्रति डॉलर के पार जा सकता है, महंगाई बढ़ सकती है और पैसा बाहर जा सकता है। हालांकि, भारत के पास फिलहाल करीब तीन हफ्ते का क्रूड ऑयल स्टॉक है, जो कुछ राहत दे सकता है। ऐतिहासिक रूप से, ऐसी भू-राजनीतिक टेंशन से इंडिया VIX (Volatility Index) जैसे वोलेटिलिटी (Volatility) इंडिकेटर्स तेजी से बढ़ते हैं।
इसके साथ ही, भारत और कनाडा ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को $50 बिलियन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है और एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर हस्ताक्षर करने पर सहमति जताई है।
खतरे की घंटी: आगे क्या हो सकता है?
तेल की कीमतों में भू-राजनीतिक जोखिम का प्रीमियम $4 से $10 प्रति बैरल तक बढ़ गया है। यदि यह संघर्ष लंबा चला, जो कि राष्ट्रपति ट्रंप के बयान के अनुसार चार हफ्ते या उससे ज्यादा हो सकता है, तो एनर्जी कॉस्ट (Energy Cost) लगातार ऊंची बनी रहेगी। ऐसे में ग्लोबल इन्फ्लेशन का खतरा बढ़ सकता है और सेंट्रल बैंक्स (Central Banks) ब्याज दरों (Interest Rates) में कटौती में देरी कर सकते हैं। AI का युद्ध में इस्तेमाल, नीतियों और अमल के बीच संभावित अंतर को दर्शाता है, जो रेगुलेटरी ओवरसाइट (Regulatory Oversight) पर सवाल खड़े करता है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावटें गंभीर हुईं, तो ग्लोबल GDP ग्रोथ पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। ट्रैवल और लॉजिस्टिक्स सेक्टर (Logistics Sector) पर भी फ्लाइट कैंसिलेशन (Flight Cancellations) और शिपिंग बीमा लागत (Shipping Insurance Costs) बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है।
भविष्य का नज़रिया
एनालिस्ट्स के अनुसार, तेल की कीमतें 2026 में औसतन $60-$63 प्रति बैरल रह सकती हैं, लेकिन अगर सप्लाई में गंभीर रुकावटें आती हैं तो यह $80 या $100 के पार भी जा सकती हैं। OPEC+ देश अप्रैल में 206,000 बैरल प्रति दिन उत्पादन बढ़ाने की उम्मीद है, जो कीमतों पर कुछ लगाम लगा सकता है। भारत में, SEBI के चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने डेरिवेटिव्स रिफॉर्म्स (Derivatives Reforms) पर 'वेट एंड वॉच' (Wait and Watch) रुख अपनाया है। SEBI का कहना है कि वे पहले मौजूदा नियमों के असर का आकलन करेंगे, जिनका मकसद अटकलों को रोकना और रिटेल निवेशकों (Retail Investors) को बचाना है। यह कदम बाजार में अनिश्चितता के बीच स्थिरता बनाए रखने पर जोर देता है, खासकर जब यह देखा गया है कि 92% से अधिक रिटेल ट्रेडर्स फ्यूचर्स और ऑप्शन्स (Futures and Options) सेगमेंट में नुकसान उठाते हैं।