महंगाई का बढ़ता खतरा
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष को लेकर महंगाई पर गंभीर चेतावनी जारी की है। IMF की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने कहा है कि अगर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में 10% की बढ़ोतरी होती है, तो इससे ग्लोबल महंगाई में 40 बेसिस पॉइंट का उछाल आ सकता है। साथ ही, यह दुनिया की आर्थिक रफ्तार को 0.1% से 0.2% तक धीमा कर सकता है।
यह स्थिति पहले से ही कई झटकों से जूझ रही अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ी चुनौती है। कच्चे तेल की कीमतें पहले ही $80 प्रति बैरल का स्तर पार कर चुकी हैं, और कुछ अनुमानों के अनुसार, यदि सप्लाई में व्यवधान जारी रहता है, तो ब्रेंट क्रूड $100 प्रति बैरल तक जा सकता है। दुनिया भर में ऊर्जा परिवहन के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में 90% की भारी कमी आई है, जो सप्लाई में तत्काल आए झटके को दर्शाता है। यह सब मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation - धीमी ग्रोथ और बढ़ती महंगाई) के खतरे में डाल सकता है।
इमर्जिंग मार्केट के सेंट्रल बैंकों की मुश्किल
मिडिल ईस्ट में छिड़े इस भू-राजनीतिक (Geopolitical) तेल संकट ने इमर्जिंग एशियन सेंट्रल बैंकों के लिए एक पेचीदा नीतिगत दुविधा पैदा कर दी है। उन्हें एक नाजुक संतुलन बनाना होगा: एक तरफ, वे ब्याज दरों को कम रखकर आर्थिक ग्रोथ को बढ़ावा देना चाहेंगे, लेकिन ऐसा करने से महंगाई और बढ़ सकती है और अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के मजबूत होने पर पूंजी का बहिर्वाह (Capital Outflows) हो सकता है। दूसरी ओर, महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाना, उनकी नाजुक आर्थिक रिकवरी को बाधित कर सकता है।
सूत्रों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), जो ग्रोथ को सहारा देने की कोशिश कर रहा है, उसे मजबूत होते डॉलर के मुकाबले रुपये को स्थिर करने के लिए अपना हस्तक्षेप बढ़ाना पड़ सकता है। इसी तरह, थाईलैंड और फिलीपींस जैसे देशों के सेंट्रल बैंकों को भी अपनी नरमी वाली मौद्रिक नीति (Dovish Stance) छोड़नी पड़ सकती है, भले ही बढ़ती ईंधन लागत उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डाल रही हो। ऐतिहासिक रूप से, तेल की कीमतों में अचानक वृद्धि से इमर्जिंग मार्केट की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है, और डॉलर जैसी सुरक्षित संपत्तियों की ओर रुझान बढ़ने से ये कमजोरियां और बढ़ जाती हैं। इमर्जिंग मार्केट की मुद्राओं में गिरावट और मौजूदा खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ने से महंगाई की उम्मीदों को बेकाबू होने का खतरा बढ़ जाता है।
करेंसी का गिरना और वित्तीय बोझ
बाजारों में तत्काल प्रतिक्रिया के तौर पर इमर्जिंग मार्केट की मुद्राओं और इक्विटी (Equities) में भारी गिरावट देखी गई है, जो हाल के वर्षों में सबसे कम स्तर पर पहुंच गई हैं। भारत जैसे देश, जिनके पास सीमित तेल भंडार है और कर्ज का स्तर ऊंचा है, वे सप्लाई में रुकावट के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। थाईलैंड, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, ताइवान और फिलीपींस जैसे देश लगातार ऊंची ऊर्जा कीमतों के प्रभाव के प्रति विशेष रूप से असुरक्षित माने जा रहे हैं।
पिछले संकटों में जहां कई विकसित देश भारी नीतिगत समर्थन देने में सक्षम थे, वहीं आज कई देशों के पास सीमित वित्तीय संसाधन (Fiscal Buffers) बचे हैं, जिससे उनकी हस्तक्षेप करने की क्षमता सीमित हो गई है। जापान जैसे देशों की आयातित ऊर्जा पर निर्भरता उन्हें भी प्रभावित कर सकती है, जो बाजार में तनाव के दौरान उसकी पारंपरिक सुरक्षित-संपत्ति वाली स्थिति को कमजोर कर सकता है। वर्तमान स्थिति भारत और इंडोनेशिया जैसे देशों में मौद्रिक सहजता (Monetary Easing) के चक्र में देरी कर सकती है, क्योंकि महंगाई की चिंताएं पहले से ही बढ़ी हुई हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ और भविष्य का अनुमान
तेल सप्लाई में झटकों के ऐतिहासिक विश्लेषण से एक पैटर्न उभरता है: अमेरिकी डॉलर (US Dollar) और कैनेडियन डॉलर (Canadian Dollar) बेहतर प्रदर्शन करते हैं, जबकि ऊर्जा आयात करने वाले देशों की मुद्राएं अक्सर कमजोर होती हैं। तेल की कीमतों पर वर्तमान भू-राजनीतिक प्रीमियम (Geopolitical Premium) ने कीमतों में तेजी से उछाल दिखाया है, जिसमें WTI फ्यूचर्स $90 प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर गए हैं।
IMF ने 2026 के लिए ग्लोबल ग्रोथ 3.3% और 2027 के लिए 3.2% रहने का अनुमान लगाया है, लेकिन यह अनुमान अब परीक्षा की घड़ी में है। मिडिल ईस्ट संघर्ष की अवधि और तीव्रता ही ग्लोबल महंगाई, ग्रोथ और करेंसी मार्केट पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव का मुख्य निर्धारक होगी। नीति निर्माताओं से आग्रह किया जा रहा है कि वे 'अकल्पनीय' के लिए तैयार रहें, क्योंकि वैश्विक आर्थिक माहौल अभी भी अनिश्चित है और बार-बार झटकों के प्रति संवेदनशील है।