Budget 2025: टैक्स में राहत का दावा खोखला? महंगाई ने बढ़ाई मिडिल क्लास की मुश्किलें

ECONOMY
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Budget 2025: टैक्स में राहत का दावा खोखला? महंगाई ने बढ़ाई मिडिल क्लास की मुश्किलें
Overview

बजट 2025 में टैक्स फ्री इनकम लिमिट बढ़ाकर ₹12 लाख करने के बावजूद, भारत के मध्यम वर्ग के कई सैलरीड लोगों को कोई खास फर्क महसूस नहीं हो रहा है। रेंट, एजुकेशन और हेल्थकेयर जैसी जरूरी चीजों पर बढ़ती महंगाई ने टैक्स बचत को खत्म कर दिया है, जिससे घरेलू बजट पर दबाव बना हुआ है। नए टैक्स रिजीम ने कुछ ज़रूरी डिडक्शन्स को हटाकर भी लोगों की मुश्किलें बढ़ाई हैं।

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टैक्स बचत बनाम असल खर्च

बजट 2025 में ₹12 लाख की नई टैक्स फ्री इनकम लिमिट का ऐलान हुआ, जो स्टैंडर्ड डिडक्शन के बाद सैलरीड लोगों के लिए प्रभावी रूप से ₹12.75 लाख हो जाती है। लेकिन, इस बदलाव से भारत के मध्यम वर्ग के कई लोगों को कोई राहत नहीं मिली है। असली समस्या टैक्स देनदारी में गणितीय कमी और असल वित्तीय सुधार के बीच का अंतर है। रेंट, एजुकेशन, हेल्थकेयर और रोजमर्रा के खर्चों पर लगातार बढ़ती महंगाई ने अनुमानित टैक्स बचत को खत्म कर दिया है, जिससे कई टैक्सपेयर्स को कोई खास फर्क महसूस नहीं हो रहा है।

महंगाई का असर

लगातार बढ़ती महंगाई ही वो मुख्य वजह है जिससे टैक्स में हुई बचत मामूली लग रही है। भारत के बड़े शहरों, खासकर मुंबई और बेंगलुरु में किराए में औसतन 25% की बढ़ोतरी हुई है, जो कि सामान्य महंगाई दर से कहीं ज्यादा है। एजुकेशन का खर्च भी सालाना लगभग 10-12% बढ़ रहा है, जबकि हेल्थकेयर इन्फ्लेशन 11-13% के बीच है। इन जरूरी खर्चों में हुई भारी बढ़ोतरी ने टैक्स में हुई किसी भी मामूली बचत को खामोशी से खत्म कर दिया है, जिससे टैक्सपेयर्स को रिटर्न पर दिखने वाले आंकड़े और उनकी रोजमर्रा की वित्तीय हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर महसूस हो रहा है।

नए टैक्स रिजीम की चुनौतियाँ

सरल बनाए गए नए टैक्स रिजीम में भले ही टैक्स की दरें कम हों, लेकिन इसने सेक्शन 80C, 80D और हाउस रेंट अलाउंस (HRA) जैसी छूटों को खत्म कर दिया है, जो पहले घर चलाने के लिए बहुत अहम थीं। हालांकि नए रिजीम में पुराने सिस्टम के ₹50,000 की तुलना में ₹75,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है, लेकिन अक्सर दूसरी छूटों के नुकसान की भरपाई इससे नहीं हो पाती। अब टैक्सपेयर्स के सामने एक मुश्किल चुनाव है: अगर किसी के बड़े निवेश या होम लोन का ब्याज जैसे खर्चे हैं, तो पुराना टैक्स रिजीम ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। वहीं, नया रिजीम उन लोगों के लिए बेहतर है जिनकी वित्तीय व्यवस्थाएं ज्यादा सरल हैं।

खर्चे सैलरी ग्रोथ से आगे

यह उम्मीद कि कम टैक्स से सीधे हाथ में आने वाला पैसा बढ़ेगा, बढ़ती महंगाई के कारण कमजोर पड़ गई है। जहां 2025 के लिए औसत सैलरी वृद्धि 9.2% से 9.5% रहने का अनुमान था, वहीं यह वृद्धि अक्सर महंगाई की मार झेल रही है। लगभग ₹60,000 (यानी हर महीने करीब ₹5,000) की सालाना टैक्स बचत शहरों में बढ़ते खर्चों, जैसे स्कूल फीस और यूटिलिटी बिल्स, से आसानी से खत्म हो सकती है। हाउसिंग की बढ़ती मांग और 'रिटर्न-टू-ऑफिस' नीतियों ने किराए में भी बड़ी बढ़ोतरी की है, जिससे लोगों की डिस्पोजेबल इनकम पर और दबाव बढ़ा है।

किसे सबसे ज्यादा फायदा?

नया टैक्स रिजीम युवा प्रोफेशनल्स या उन लोगों के लिए ज्यादा फायदेमंद लगता है जिनकी वित्तीय जिंदगी सीधी-सादी है और जो सरलता को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि, मध्यम वर्ग के उन परिवारों के लिए जिनके पास लोन, बच्चों की पढ़ाई और हेल्थकेयर जैसी कई वित्तीय जिम्मेदारियां हैं, इसके फायदे उतने स्पष्ट नहीं हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वित्तीय तनाव कम हुआ है? मध्यम वर्ग के एक बड़े हिस्से के लिए, इसका जवाब 'नहीं' है, क्योंकि महसूस की गई टैक्स राहत ज्यादातर टैक्स फाइलिंग तक ही सीमित है, न कि रोजमर्रा के वित्तीय प्रबंधन में सुधार के रूप में।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.