आज भारतीय शेयर बाज़ार में **0.5%** से ज़्यादा की बढ़ोतरी देखने को मिली। इसकी मुख्य वजह कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट है, जिससे महंगाई (inflationary concerns) पर लगाम लगने की उम्मीद है। ऑटो और फाइनेंसियल सेक्टर के स्टॉक्स में ज़बरदस्त उछाल आया, हालांकि निवेशकों की नज़र मॉनसून की कमी के चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर पर भी है।
क्या हुआ?
गुरुवार को भारतीय शेयर बाज़ारों में तेज़ी के साथ कारोबार की शुरुआत हुई। सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty 50) दोनों में 0.5% से ज़्यादा का उछाल देखा गया। इस रैली के पीछे कच्चे तेल की कीमतों में आई बड़ी गिरावट है। ब्रेंट क्रूड (Brent crude) का भाव $73 प्रति बैरल के नीचे चला गया है। ऐसा माना जा रहा है कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव कम होने और ईरान-अमेरिका के बीच बातचीत में प्रगति की ख़बरों से यह गिरावट आई है।
भारत के लिए क्यों ज़रूरी है क्रूड ऑयल?
भारत अपनी ज़रूरत का 85% से ज़्यादा कच्चा तेल इम्पोर्ट करता है। इसलिए, तेल की कीमतों में लगातार गिरावट को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा पॉजिटिव साइन माना जा रहा है। इससे देश का इम्पोर्ट बिल कम होगा, रुपया मज़बूत होगा और करेंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) को कंट्रोल करने में मदद मिलेगी। साथ ही, महंगाई पर काबू पाने में भी आसानी होगी, जिससे कॉर्पोरेट मुनाफे को भी फायदा पहुँच सकता है क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग और ट्रांसपोर्टेशन कंपनियों की इनपुट कॉस्ट (input costs) कम होगी।
कौन से सेक्टर्स कर रहे हैं लीड?
आज के बाज़ार में ऑटोमोटिव (Automotive) और फाइनेंसियल (Financial) सेक्टर सबसे आगे रहे। निफ्टी ऑटो इंडेक्स (Nifty Auto index) में तेज़ी देखी गई, क्योंकि जानकारों का मानना है कि तेल की कम कीमतों से कंपनियों की लागत कम होगी और कंज्यूमर की खर्च करने की क्षमता बनी रहेगी। बैंकिंग शेयरों में भी मजबूती दिखी, जिसने बाज़ार को सहारा दिया। वहीं, आईटी (IT) सेक्टर में मिला-जुला कारोबार रहा।
मॉनसून का रिस्क फैक्टर
तेल की कीमतों में गिरावट से बाज़ार को भले ही बूस्ट मिला हो, लेकिन एनालिस्ट्स ने कुछ मैक्रो-इकोनॉमिक (macroeconomic) रिस्क की ओर भी इशारा किया है। इनमें सबसे बड़ा है मॉनसून का प्रदर्शन। अगर मॉनसून ज़रूरत से कम रहा, तो एग्रीकल्चर आउटपुट (agricultural output) और ग्रामीण आय पर बुरा असर पड़ सकता है। इसका सीधा असर उन सेक्टर्स पर पड़ेगा जो ग्रामीण मांग पर निर्भर करते हैं, जैसे ट्रैक्टर, फर्टिलाइज़र, एग्रोकेमिकल्स और एंट्री-लेवल टू-व्हीलर्स। निवेशक तेल की कीमतों में गिरावट के फायदे और मॉनसून की कमी से ग्रामीण खपत में संभावित नरमी के बीच संतुलन बना रहे हैं।
आगे क्या देखना ज़रूरी?
आने वाले दिनों में निवेशक तीन मुख्य चीज़ों पर नज़र रखेंगे: पहला, कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता। दूसरा, ग्रामीण इलाकों के बिज़नेस की सेहत का पता लगाने के लिए मॉनसून का डेटा। और तीसरा, ग्लोबल मार्केट के संकेत, खासकर साउथ कोरिया जैसे टेक-हैवी मार्केट्स में उतार-चढ़ाव, जो फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (foreign institutional investors) के फ्लो को प्रभावित कर सकते हैं। कंपनियां अपनी आने वाली नतीजों में यह भी बताएंगी कि वे कम ऊर्जा कीमतों का फायदा कैसे उठाना चाहती हैं।
