सरकारी खजाने पर टैक्स का बोझ
महाराष्ट्र में फ्यूल पर लगने वाले टैक्स को लेकर चल रही मांग ऐसे समय में आई है जब राज्य का खजाना पहले से ही दबाव में है। अगर पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले वैल्यू एडेड टैक्स (VAT) और सरचार्ज को पूरी तरह से हटा दिया जाता है, तो कीमतें ₹70-80 प्रति लीटर तक आ सकती हैं। लेकिन, महाराष्ट्र की सरकार के लिए यह एक बड़ी आर्थिक मुश्किल खड़ी कर सकता है। राज्य, कई दूसरे राज्यों की तरह, अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले टैक्स से होने वाली कमाई पर काफी हद तक निर्भर है। टैक्स हटाने से बजट में भारी कमी आ जाएगी, जिसके चलते सरकार को या तो ज्यादा कर्ज लेना पड़ेगा या फिर दूसरी जरूरी योजनाओं पर खर्च कम करना होगा।
महंगाई और सप्लाई चेन का चक्कर
आज फ्यूल की बढ़ती कीमतें सिर्फ टैक्स की वजह से नहीं हैं, बल्कि सप्लाई में आ रही दिक्कतों का भी नतीजा है। मुंबई में जहां पेट्रोल ₹111.12 और डीजल ₹96.86 प्रति लीटर बिक रहा है, वहीं इन बढ़ी हुई कीमतों का असर जरूरी सामानों के ट्रांसपोर्टेशन पर भी साफ दिख रहा है। भले ही नेता जनता को राहत देने की बात कर रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि ट्रांसपोर्टेशन की लागत में फ्यूल एक अहम फैक्टर है। लगातार बढ़ती कीमतें कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) पर भी असर डालती हैं, जिससे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए महंगाई को कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है और उसे मॉनेटरी पॉलिसी में सख्ती करनी पड़ सकती है।
रेवेन्यू घटने का खतरा
आर्थिक जानकारों की मानें तो फ्यूल टैक्स में कटौती की यह मांग राज्य सरकार के सामने एक मुश्किल पहेली की तरह है। महाराष्ट्र सरकार एक तरफ राज्य के कर्ज (Debt-to-GSDP ratio) को संभालने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ जनता को राहत देने का दबाव भी है। अगर सरकार जनता की मांग मान लेती है, तो उसके सीधे रेवेन्यू सोर्स में तुरंत कमी आ जाएगी। इतिहास गवाह है कि जिन राज्यों ने फ्यूल पर टैक्स में बड़ी कटौती की, उन्हें मुश्किल आर्थिक समय में या केंद्र से मिलने वाले टैक्स के हिस्से में कमी आने पर काफी दिक्कतें हुई हैं। इसके अलावा, अगर केंद्र सरकार भी अपना एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) कम नहीं करती है, तो आम ग्राहकों को मिलने वाली राहत उम्मीद से कहीं कम हो सकती है।
लंबे समय में बाजार पर असर
इन्वेस्टर्स और मार्केट एनालिस्ट इस स्थिति पर नजर रखे हुए हैं कि कहीं कोई राजनीतिक अस्थिरता राज्य के कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) को प्रभावित न करे। अक्सर, पॉपुलिज्म (Populism) के चलते टैक्स पॉलिसी में बड़े बदलाव पब्लिक फाइनेंसिंग में अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं। अगर सरकार短期 राहत को लॉन्ग-टर्म आर्थिक स्थिरता पर तरजीह देती है, तो राज्य के डेवलपमेंट बॉन्ड्स पर यील्ड (Yield) का दबाव बढ़ सकता है। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सरकार एक टारगेटेड सब्सिडी (Targeted Subsidy) का रास्ता अपनाती है या फिर राज्य के टैक्स स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव का जोखिम उठाती है।
