साल 2026 भारतीय शेयर बाजारों के लिए मुश्किल भरा रहा है। MSCI India Index में **13%** की गिरावट आई है, क्योंकि विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब **$29 अरब डॉलर** निकाल लिए हैं। इस बिकवाली के कारण भारत ग्लोबल मार्केट में पिछड़ गया है।
विदेशी बिकवाली और घरेलू सपोर्ट
इस साल भारतीय शेयर बाजार की नरमी की मुख्य वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली रही है। साल 2026 की शुरुआत से ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी से लगभग $29 अरब डॉलर निकाले हैं। इस बिकवाली के पीछे साल की शुरुआत में शेयरों का महंगा वैल्यूएशन, कंपनी की कमाई में आई सुस्ती और ग्लोबल ट्रेड पॉलिसी को लेकर चिंताएं शामिल हैं।
इसके जवाब में, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने बाजार को सहारा देने की कोशिश की है। उन्होंने $50 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है। हालांकि, यह घरेलू निवेश विदेशी बिकवाली के भारी दबाव को पूरी तरह से कम नहीं कर पाया है। नतीजतन, Nifty 50 इंडेक्स साल-दर-तारीख 8.7% नीचे है।
वैल्यूएशन और सेक्टर ट्रेंड्स
बाजार में आई इस गिरावट के बाद वैल्यूएशन अब ज्यादा वाजिब स्तर पर आ गए हैं। Nifty 50 इंडेक्स फिलहाल अपने एक साल के फॉरवर्ड अर्निंग्स का 18.8 गुना पर ट्रेड कर रहा है, जो कि इसके लॉन्ग-टर्म एवरेज 21 गुना से कम है। इसका मतलब है कि पहले जो वैल्यूएशन प्रीमियम था, वह अब काफी कम हो गया है। लगभग दो-तिहाई सेक्टर अपने ऐतिहासिक औसत वैल्यूएशन से नीचे कारोबार कर रहे हैं। प्राइवेट बैंक, कंज्यूमर गुड्स, टेक्नोलॉजी और रिटेल जैसे सेक्टर अपने ऐतिहासिक रेट के मुकाबले डिस्काउंट पर मिल रहे हैं। वहीं, कैपिटल गुड्स, पब्लिक सेक्टर बैंक, मेटल, हेल्थकेयर और यूटिलिटीज जैसे सेक्टर प्रीमियम पर बने हुए हैं।
आर्थिक प्रदर्शन और भविष्य का अनुमान
शेयरों में गिरावट के बावजूद, भारत की इकोनॉमी मजबूत बनी हुई है। 2026 के फाइनेंशियल ईयर में जीडीपी ग्रोथ 7.7% रही, जो अनुमानों से बेहतर है। Nifty 500 कंपनियों का प्रॉफिट-टू-जीडीपी रेशियो 5.2% के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। ऑटोमोबाइल, ऑयल एंड गैस, मेटल और इंश्योरेंस जैसे सेक्टर इस मजबूत प्रॉफिट परफॉर्मेंस में बड़े योगदानकर्ता रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि आगे बाजार की चाल ब्रॉड इंडेक्स के प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि कंपनियों के व्यक्तिगत ग्रोथ पर ज्यादा केंद्रित होगी। बाजार में रिकवरी के लिए कुछ प्रमुख फैक्टर विदेशी पूंजी की वापसी (अगर ग्लोबल इंटरेस्ट रेट घटते हैं), 7% से ऊपर जीडीपी ग्रोथ और सरकार द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार खर्च करना हो सकते हैं।
